...etc (Mini-Blog)

Random thoughts...



सुख

posted May 4, 2018, 10:50 PM by Abhishek Ojha


पिछले दिनों शहर में घूमते हुए ख्याल आया - हर किसी को उतना ख़ुश होना चाहिए जितना  इस शहर में लोग  खुबसूरत मौसम होने पर खुश होते हैं. लम्बी सर्दियों के बाद पहली बार जब तापमान २५ डिग्री के आस पास पहुँचता है. ये आश्चर्यजनक लगता है कि पूरा शहर ही अविश्वनीय रूप से खुश हो जाता है. सभी लोग खुश लगते हैं. हो सकता है कि मुझे - हरा ही हरा दीखता हो - पर लोग सच में वैसे ही खुश होते हैं - जैसे महीनों ठण्ड में बिल में छुपी गिलहरी बाहर निकल कर फुदकने लगी हो. प्रवासी पक्षी वापस आकर चहकने लगे हों - वैसे ही इंसान भी निकल आते हैं - सड़कों पर, पार्क में - हर जगह. फैशन शहर में अवतरित हो जाता है. ऐसा लगता है जैसे लोग एक अलग मानसिक स्तर पर होते हैं. लोगों के दुःख कहीं चले तो नहीं जाते होंगे पर एक अलग मन: अवस्था जरूर होती होगी. घूमते समय सभी को वैसे देख आप खुद को प्रसन्न होने से रोक नहीं सकते. जैसा प्रवाह वैसे ही तो हम भी हो जाते हैं - प्रसन्न मन !
समझ आता है कैसे सदियों पहले मनीषियों ने सूर्य को पृथ्वी पर जीवन का स्रोत बता दिया होगा. सनातन बोध ! गमले में लगे पौधों को देखकर मुझे लगता है कैसे उत्तरायण इतना बड़ा पर्व हो गया. संक्रांतियाँ कैसे बनी. हर सभ्यता में. सूर्य के उत्तरी गोलार्ध में आने से जीवन उत्तरी गोलार्ध में आया दक्षिण में जाने से दक्षिण. जीवन चहक उठता है. सुस्त पड गए धरातल पर जान फूंकने जैसा. समझ आता है कैसे होली और मदनोत्सव जैसे त्योहारों का जन्म हुआ होगा. सूर्य की पूजा शुरू हुई होगी. 

वैसे सुख परिभाषित करना इतना आसान कहाँ ! पिछले दिनों किसी ने मुझसे पूछा - तुम अपने जीवन से सुखी हो?. पहले तो ऐसे सवाल क्यों ही पूछते हैं लोग ! और इतना सोचता कौन है ? जो सुखी हूँ या नहीं पर मनन करे वो तो वैसे ही सुखी नहीं रहेगा ! मैंने कहा इस सवाल का जवाब हाँ या ना तो नहीं हो सकता हां मुझे लगता है कि अक्सर मैं खुश रहता हूँ. बाद में ये भी लगा कि मैंने कहीं लिखा था - अगर कभी मौका मिले जीवन में वापस जाकर कुछ बदल पाने का और आप कुछ न बदलें तो आप सुखी हैं. अगर उस हिसाब से सोचूँ तो मैं अपने को सुखी वाले साइड ही पाता हूँ.  खैर... 

खैर... उसी खुबसूरत मौसम वाले दिन. शाम को हम अपनी पसंदीदा जगह गए. नदी का किनारा. पानी के ऊपर बना एक पार्क और उसके पीछे शहर का स्काईलाइन. खुबसूरत जगह है. प्रकृति और कृत्रिम का अद्भुत संगम.  जब मौसम अच्छा हो तो हम शाम को वहीँ पाए जाते हैं. लोगों का आना जाना - सब कुछ बहुत सुकून भरा होता है. दिन का खुबसूरत समय. (जब जब मौसम अच्छा हो).वहां एक ग्रुप है जो अक्सर डांस करता है. दर्जन भर लोग होंगे. चाइनीज हैं या कोरियन मुझे नहीं पता. पर अच्छे मौसम में वो अपनी धुन में डांस करते मिल जाते हैं. एक छोटा सा क्लिप भी है पिछले साल का इस लिंक पर.

जो लीडर हैं वो काला चश्मा जरूर पहनते हैं ! बिना किसी की परवाह किये अपनी धुन में मस्त. उनमें से लगभग कोई अंग्रेजी नहीं बोलता. ...उस दिन कुछ ख़ास हुआ. एक लड़की आई और उसने 'लीडर' से कहा कि उसे उनका डांस बहुत पसंद है. उसने अपने फ़ोन में  पिछले साल की रिकोर्डिंग भी दिखाई.  और दिखाकर कहा कि मुझे इस वाले गाने पर आप लोगों के साथ डांस करना है. 

उस समय जो मैंने देखा - उसे ख़ुशी कहते हैं. उस क्षण को ! लीडर के चेहरे पर जो भाव था उसे ख़ुशी कहते हैं. वो लगभग दौड़ कर अपने ग्रुप से दो औरतों को बुला कर लाया. मुझे भाषा तो नहीं समझ आई पर इतना समझ जरूर आया कि - 'देखो, देखो मैं कहता था न कि हम बहुत अच्छा डांस कर रहे हैं. बताओ बताओ ये लड़की क्या कह रही है?' जैसा कुछ कहा. उतनी ख़ुशी ऑस्कर जितने वालों को नहीं होती होगी. निश्छल. अद्भुत सा. 


फिर पता चला कि उन्हें भी ये पता है कि हम अक्सर बैठकर देखते हैं  उन्हें. उन्हें झुककर हमारा भी अभिवादन किया - थैंक यु, थैंक यू कहा. पर उस एक पल वो इंसान जितना खुश था भगवान सबको उतना खुश रखें :)

Emotional Status Messages

posted Feb 20, 2018, 4:19 PM by Abhishek Ojha   [ updated Mar 8, 2018, 9:01 AM ]


हमारी हर बात हमारे बारे में कुछ न कुछ बताती हैं... हर वो काम जो हम करते हैं. चलने और बोलने का तरीका तक. और जब सोशल मीडिया का ज़माना है तो आप कैसी बातें शेयर या लाइक करते हैं वो भी बहुत कुछ कहता है. फिर कई लोगों की पसंद में एक पैटर्न दीखता है. सबसे ज्यादा जज़्बाती (emo) स्टेटसों में. एक ख़ास तरह के लोग ही ऐसी बातों को पसंद और शेयर करते हैं। तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो गाने की तरह. एक तो ऐसी सारी बातें लिखी भी ऐसे लोगों को ही लक्ष्य करके की जाती हैं जो टूटे हुए हैं. कहीं न कहीं अधूरे से. मन में एक टीस पाले. जिनका कुछ अधुरा छुट गया अब वो कहीं रहते हैं उनका मन कहीं. और मजे की बात ये है कि ये तथाकथित ‘पोजिटिव’ और गहरे सन्देश वास्तव में घाव को भरने की जगह कुरेदने का काम करते हैं जिनसे लोग अपने अहं (ईगो) को बढ़ाते (फीड) ही करते हैं. एक ख़ास तरह के लोग ही इन संदेशों को पढ़ते और उसे पसंद करते हैं. ये कुछ कुछ ज्योतिष कथनों की तरह होते हैं. ज्योतिष में कुछ जेनेरिक – सब पर फिट होने वाली बातें होती हैं. वैसे ही ये बिखरे-टूटे लोगों पर फिट बैठने वाली पंक्तियाँ होती हैं. 

‘आप दिल के बहुत अच्छे हैं लेकिन आपको कोई समझ नहीं पाता’ – जबकि होता ऐसा है कि आप दिल के अच्छे हैं तो लोग समझेंगे ही ! 

 जैसे - आपने अगर जिंदगी में लोगों को खोया है तो इसलिए कि आप कुछ सही कर रहे थे. (जी नहीं आप सही करने के लिए लोग नहीं खोते) या अगर आप की सभी से दोस्ती है तो आपने ज़िंदगी में बहुत समझौते किए हैं ! क्या? जी नहीं ऐसा नहीं होता। 

 तुम तकलीफ में हो क्योंकि तुम सबसे अच्छे हो? (अच्छे लोग तकलीफ में होते हैं?) 

 दुनिया मूर्खों से भरी पड़ी है. तुक अकेले बुद्धिमान हो और इसलिए तुम डिप्रेस हो. (J) डिप्रेस होना अच्छी बात है? फिर तो बेवक़ूफ़ होना ही अच्छा हुआ? ! दिल से सोचने वाले लोग दुखी रहेंगे ही। (तो बिना दिल के रहना ही अच्छा है !) 

अच्छे इंसान बनो लेकिन इसको साबित करने में टाइम मत ख़राब करो. (मतलब ये कि किसी ने तो तुमे सच्चाई का आइना दिखाया और जरूर तुम उसी में डूबे रहते हो J

 खैर, ये दुनिया और इसमें रहने वाले लोग ! J


व्हाट्सऐप फॉरवर्ड में भी अक्सर एक फूटनोट लगा होता है - 'गीता में लिखा है', ग़ालिब, बच्चन. इत्यादि. जो लगभग हमेशा ही गलत होता है. और आजकल 'मनोविज्ञान कहता है.' और मैसेज घुमा फिरा कर यही कहता है कि तुम बर्बाद ही ठीक हो. साइकोलोजी नया फुटनोट है. पढने वाले को लगता है बिलकुल सच है ! क्योंकि उसकी बात जो कही जा रही है और साथ में वो प्रमाणित भी होती प्रतीत हो रही होती है. तो घुमा फिरा के इस ज्ञान के प्रवाह में लोग सीखने की जगह और रूढ़ ही होते जा रहे हैं. जो अपने मन का नहीं वो क्यों पढना जब हर दूसरा मैसेज मेरे मन का ही है ! इन फॉरवर्ड्स से सिर्फ एक बात सीखने लायक होती है और वो ये कि इनको पढने की जगह... फूटनोट में जो लिखा है उन्हें पढ़ा जाय. वो पढ़िए इसलिए क्योंकि तब आपको पता चलेगा कि जो आप पढ़ रहे हैं वो सच नहीं है !

JNU Attendance row

posted Feb 13, 2018, 1:39 PM by Abhishek Ojha   [ updated Feb 13, 2018, 2:05 PM ]


Disclaimer: I am not from JNU. On a WhatsApp group a very good friend who is a JNU alumnus shared couple of articles about attendance row in JNU (written by JNU profs). This was my response. (Yes, I do write long messages sometimes and pardon my English - IT WAS A WHATSAPP MESSAGE!!!)

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I disagree. And I am sure you will agree to at least some of the points below... and won’t say ki tum kya jaano JNU kya hai :)

I don't see the point how attendance can be against any spirit? There should be ways to accommodate those who cannot attend classes for a valid reason or different norms for research scholars in field. (It seems there is already!)

Attendance is just plain accounting to make sure all students are participating. If they are already participating then there is never going to be an issue at all. The arguments in article are flawed ... I will give an analogy. (for example) I own an NGO that does a great service to society but we don't do any accounting. If someone asks us to show my financial accounts should I just start arguing about how this will be against spirit of my NGO? How I have been doing great work and keeping accounts will just be an additional burden and a waste of time? Why anyone rational, who is not part of my NGO, will not question my motives? Why won't they argue that I am running an agenda of routing money and all people working for me are just doing aish on money collected in the name of charity? How will you make sure that there is no corruption? 

Do you think there are some research scholars who get paid and never show up in the class and their guides agree to it? even one? What if a faculty member says - you don't need to show up, Keep doing what you are doing (get a job?) I will take care of everything.  How would you know a faculty member is not doing it for his or her ideology (left or right, Islamic or Hindutva, Naxal or anything else)?

I think attendance should be tracked but not forced as a control. Data always helps, so no harm in tracking. If students don’t like a particular class, attendance will provide support for that too. Do some data analysis on attendance and beautiful results might emerge to introspect! Get a class cancelled if there is not enough interest. And if students should have absolute right not to attend classes then shouldn’t JNU administrator also have absolute right to fail someone? Fair?

Interesting that science faculty (25%? of JNU) is silently away from all this (maybe because evaluation is more quantifiable in science). Rest few who are boycotting, their argument is oxymoron- you attend all the classes so you are boycotting the attendance?. That argument is logically inconsistent. If they attend all classes attendance is not going to do any harm, To None of the things mentioned in article. Pregnant ladies attend Ivy League too and they teach too etc. etc.! A single argument against all those things - JNU is not only university that has field works and I am sure there are ways to accommodate that, if not - that should be protested.  Attendance tracking needs exceptions not the no-rule anarchy. If someone wants to study all the time without attending classes why they even need to be a student at JNU? That place is called a bookstore or library or Google - not the University. To do real social work (which students claim they need to do and learn) a person doesn’t need an enrollment, a degree, a hostel or govt money! As you said even students from DU come to attend lectures of few Profs at JNU... So let the students also do that without enrollment and do whatever they want. They will have all the freedom to change the society, and all the time in this world to study. Ye waise hi hai jaise paise ke liye hue har jhagde ke baad log kahte hain baat paise ki nahin hai baat ijaat ki hai. JNU waale kah rahe hain baat classes attend karne ki nahin hai baat regressive policy ki hai. Believe me if someone is that intellectually curious, they don’t need no University in world neither they will have time to protest, so that claim is just…

How can something as simple as plain attendance be unproductive or meaningless... if it is then so is a degree. So is HR department in my office and all sorts of accounting in this world. Why audit and why accounting… all Enrons are fair till they are not. No one is stopping a student to study at a Dhaaba (they should have an unofficial Dhaba attendance too, if they are that serious about it!) but from administration perspective profs should make classes interactive and even those students, who don’t go to compulsory Dhaaba sessions, should get a chance to learn from each other in classes. 

 

Most top schools in the world have policy for attendance in place, which professors can use or not use so it varies by class. That doesn’t make them worse than JNU! Neither denies the freedom of any kind. Some Profs Care about it, most don't. If discussions are part of evaluation, especially in humanities, attendance becomes part of grade too. Again, Attendance as a policy is not regressive.  If we think that way all laws are regressive, traffic laws are regressive, police is regressive, putting a seat belt is regressive (should it be my choice?), anything that I don’t like is regressive ! I teach a master’s class and I don’t like taking attendance. I ask my TA to take attendance and inform me only if someone is missing from all the classes (that is mandatory to do). I also tell students in first class that they are free not to attend my classes but it is interesting that almost all of them still do. I guess it is not because I am a great teacher... but because... 1. Most students (especially foreign) have an incentive to get a job after the course so they try their best. 2. Because I am going from industry they have more incentive of doing some networking. Personally, I don’t think compulsory attendance makes much difference but incentives definitely do, and that is what I think is missing at JNU. Some students don’t have incentive to attend classes or graduate but to stay back in campus as long as they can! – Psychology 101.

In my limited experience, actually it makes more sense to have proper accounting in higher education (on the contrary of what you suggested that it is more important at undergraduate level) because students have more incentive to not study and stay longer at the colleges if they are getting paid (and prospects of getting job outside is not very good). And at least in US, all profs I talk to say that undergrad students are by far more serious, ask more questions, attend classes etc etc. and when you say attendance was not compulsory in IIT, that is not entirely true. Dual degree students, once they started getting paid had to mark their attendance [CS guys used to mark it 11.59PM and 12.01AM in CS building to mark two days at once, till it became an issue :)]. In the article it is emphasized that students who are 'adults' - well my argument is have you ever heard about a corrupt kid? You need accounting for adults and not the kids. Do you think all adult students are serious, honest and know what they are doing?

 

Also, I read completely different view from some other Profs at JNU itself, on why JNU needs attendance! (Couple of Profs on twitter and some articles). According to media, some research students get paid for doing nothing (which is in contrary to what is written in both the articles). I know a friend who came to US for PhD but converted his PhD in masters after 2 years because he was losing his scholarship. How many students at JNU in humanities have to work hard because they are afraid they might lose their scholarship? The article is saying passively that no one should lose scholarships, why? I am sure JNU has things in place too to make sure of integrity but if I believe other reports in media reality seems very different. No disrespect but if a prof has been teaching from last 30 years it also means that she will naturally be opposed to any change (my NGO example!). In my perspective, any Accounting is not regressive but fair and people don’t see other side if they are influenced by certain ideologies. If things are so fair in JNU, attendance will just attest that. The reaction should just be – oh come on, we are already fairest of fair! Rather than... how dare you ask me to attend classes? in my NGO example, say I am working for cancer patients and I argue that for years I have been doing best possible work in the world, how dare you ask me to show my accounts? How does that sound?

 

The issue seems to be how can Jagdish Kumar decide something about JNU, 'not my VC' kind of thing, unconditional opposition. If JNU promotes freedom it should also promote the freedom to see other side... I guess JNU needs more tolerance. Govt should just add more science disciplines, more interdisciplinary research and some free market thinkers, Milton Friedman and the Chicago School of Economics kind of thought too.  From what I read it seems obvious that if someone is a staunch rightist student or faculty, then JNU gives them really really hard time. That’s how left has always been! You should know better about differences of ideologies in next door DSE and JNU economics departments (or ISI for that matter)... I think DSE sends more economists to industry? What makes the difference? In my view third way (middle way) is always better than one or another. I am not completely against cigar smoking arm chair thinkers, and people still fantasizing Marxism in 2018... but one thing JNU can teach them is to listen and respect the other side as well and think a little, just a little more rationally.

On personal note - I feel like I missed the opportunity; I should have taken admission in JNU for few years on govt money, with a job in Delhi (or maybe it is still not too late).

Saans le paate to Mauj ke din hote, after all Dilli mein hai :)


+ there is a thing called distance education too and real, I mean really real social work for those who are really interested.

मोबाइल फ़ोन - छठी इन्द्रिय

posted Dec 17, 2017, 3:38 PM by Abhishek Ojha


तीन छोटी घटनाएं जो फ़ोन के साथ न होने से घटित हुई और बहुत अच्छा सा लगा !  - 

पिछले दिनों हम मेक्सिको में थे. मेरा फ़ोन न इस्तेमाल करने का कोई नियम तो नहीं है पर अक्सर हम फ़ोन घर पर ही छोड़ कर बाहर चले जाते हैं. और वीकेंड पर भी फ़ोन से एक दूरी बनी रहती है. ऑफिस में रहने का समय ही ऐसा होता है जब फ़ोन बगल में पड़ा होता है. लंच के लिए भी जाते समय फ़ोन कई बार डेस्क पर छूट जाता है. पर मैं घड़ी जरूर पहनता हूँ. आदत है. पर इस यात्रा पर ... घड़ी भी नहीं थी. मेरी पसंदीदा 'सून्तो' घडी का फीता टूटा हुआ था और दूसरी घड़ियाँ  'फॉर्मल' सी हैं.  इस यात्रा पर ऐसा हुआ कि फ़ोन होटल में ही पड़ा रहता और हम बेफिक्र घूमते. अगर कहूं कि समय का अंदाजा लगता दिन में सूरज देखकर और रात में तीन दंडीयाँवाँ  देखकर तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. (तीन दंडीयाँवाँ - अर्थात तीन तारे जो एक सीध में होते हैं, और सप्तर्षि, ध्रुव तारा हम बचपन में छत पर लेटकर खूब देखते, होटल के बीच  पर रात में भी कुर्सियां पड़ी रहती तो बहुत दिनों के बाद ये भी देखा. साफ़ रात हो तो आँखें ऊपर जरूर उठ जाती हैं और दिमाग अपने हिसाब से दिशा और समय का अंदाजा लगाने लगता है). मुझे याद नहीं इससे पहले मैंने कब किसी से समय पूछा होगा... सालों बाद या शायद पहली बार किसी से पूछा - क्या समय हो रहा है. एक द्वीप से वापस आने के लिए फेरी के समय का ध्यान रखना था.  मुझे याद है बचपन में ये आम बात हुआ करती. लोग आते जाते लोगों  से समय पूछा करते. रेडिओ से घड़ियाँ मिलाई जाती. चाभी देने वाली घड़ियाँ होती (मेरे पास अब भी है) ! बिन फ़ोन, घडी बिना ये पूछना सुखद था.  क्यों? - पता नहीं ! 

एक दिन ऑफिस में एक मीटिंग के लिए एक कांफ्रेंस रूम में हम पांच लोग थे. लन्दन के ऑफिस से कुछ और लोगों कोआना था मीटिंग में लेकिन डायल करने के लिए मीटिंग की आईडी चाहिए थी. मीटिंग शुरू हुई तो पता चला हममें से पाँचों लोग अपने फ़ोन अपने डेस्क पर छोड़ आये थे ! जब ये पता चला तो कोई एक उठ कर गया अपना फ़ोन लाने. पता नहीं लोगों को कैसा लगा पर मुझे बहुत अच्छा लगा. अब भी बिना फ़ोन के लोग कुछ मिनट जिन्दा रह लेते हैं !  और आज के समय में क्या प्रोबेबिलिटी है जी कि बिना अपना फ़ोन लिए पांच लोग मीटिंग में आ जाएँ? ! 

तीसरी घटना... मेक्सिको में ही 'चिचेन इत्ज़ा' जाने के लिए हमने होटल से गाडी ली थी जिसमें कुछ और लोग थे. मैंने देखा पूरे रास्ते केवल हम थे जिन्होंने हर १० मिनट बाद फेसबुक नहीं खोला होगा. मुझे लगा पिछले चार सालों में अगर जोड़ने बैठ जाऊं तो कितने महीने हों जायेंगे जो फेसबुक पर नहीं होने से मैंने वैसे जीया जैसे जीना चाहिए. वो समय वहां गया जहाँ उसे जाना चाहिए. कितना कुछ अपने इन्द्रियों से महसूस किया फ़ोन से नहीं ! मेरी कोई इच्छा नहीं होती अब फेसबुक पर वापस आने की. लोगों को फेसबुक स्क्रॉल करते देख गर्व सा होता है. हम एक नशे से बचे हुए हैं. चार साल से अधिक हो गए और वो जैसे भी हुआ हो... बहुत अच्छा हुआ !  हाल में ही एक इटालियन फिल्म देखा था - परफेक्ट स्ट्रेंजर्स ! उसके बाद तो लगा फ़ोन दैत्य ही है !  खैर बाबा बनने का कोई इरादा नहीं है पर आप ये पढ़ रहे हैं तो कहूँगा कि फ़ोन को अपनी छठी इन्द्रिय मत बनाइये. जो इन्द्रियाँ हैं उनका भी इस्तेमाल कीजिये. दुनिया बेहतर दिखती है. समझ भी आती है. जो अपनी छुट्टियों का आँखों देखा हाल इन्स्टाग्राम किये जा रहे हैं यकीं मानिए उनकी छुट्टियां बस इन्स्टाग्राम पर ही परफेक्ट हैं !   

पर हाँ मेरे ब्लॉग अगर आप फ़ोन पर पढ़ते हैं तो वो बंद मत कीजियेगा :) :) 


...the theory is correct !

posted Dec 6, 2017, 2:10 PM by Abhishek Ojha



I am reading Elegant Universe - a beautiful book. Here is a paragraph from the book describing when Einstein's theory was confirmed by experiments. - 

[Dutch Physicist Hendrik Lorentz sent Einstein a telegram informing him of the good news. As word of the telegram 's confirmation of general relativity spread, a student asked Einstein about what he would have thought if Eddington's experiment had not found the predicted bending of starlight. Einstein replied, "Then I would have been sorry for the dear Lord, for the theory is correct."

Of course, had experiments truly failed to confirm Einstein's predictions, the theory would not be correct and general relativity would not have become a pillar of modern physics. But what Einstein meant is that general relativity describes gravity with such a deep inner elegance, with such simple yet powerful ideas, that he found it hard to imagine that nature could pass it by. General relativity, in Einstein's view, was almost too beautiful to be wrong.]

People may call it Einstein's arrogance.. but if you have been through something beautiful... coherent, logical, symmetrical, truth - you know what he meant. Something so logical.. so pure. Like when you are in love.. and You don't give a damn about what anyone thinks about your feelings. Not even god, not even the person you love ! You just know that it can not be wrong. You just know it ! You know it when you have done everything perfectly and beautifully. I remember someone told me once something about Grah, Nakshatra etc. and I said - mere chakkar mein barbaad ho jaayenge grah, nakshatra. Solar system collapse ho jaayega. kaho apne kaam se kaam rakhein.

I wish you have lived that feeling. Not of inventing Relativity :P :D but something very simple but purely beautiful - a deep inner elegance ! 

Physics is mystical !

posted Nov 25, 2017, 4:51 PM by Abhishek Ojha   [ updated Nov 25, 2017, 4:51 PM ]

Physics is mystical. I am sure it is mystical for those who actually derive the equations but it is also for those who don't want to go into those details... outside the exams and textbooks the 'physics in words’. 'Elegant Universe’ is an amazing book in that sense, halfway through the book and I am already searching for similar books… 

“In 1965, Richard Feynman, one of the greatest practitioners of quantum mechanics, wrote, There was a time when the newspapers said that only twelve men understood the theory of relativity. I do not believe there ever was such a time. There might have been a time when only one man did because he was the only guy who caught on, before he wrote his paper. But after people read the paper a lot of people understood the theory of relativity in one way or other, certainly more than twelve. On the other hand I think I can safely say that nobody understands quantum mechanics.

Although Feynman expressed this view more than three decades ago, it applies equally well today. What he meant is that although the special and general theories of relativity require a drastic revision of previous ways of seeing the world, when one fully accepts the basic principles underlying them, the new and unfamiliar implications for space and time follow directly from careful logical reasoning. [….] Quantum mechanics is different. By 1928 or so, many of the mathematical formulas and rules of quantum mechanics had been put in place and, ever since, it has been used to make the most precise and successful numerical predictions in the history of science. But in a real sense those who use quantum mechanics find themselves following rules and formulas laid down by the "founding fathers" of the theory—“calculational procedures that are straightforward to carry out—without really understanding why the procedures work or what they really mean. Unlike relativity, few if any people ever grasp quantum mechanics at a "soulful" level.

What are we to make of this? Does it mean that on a microscopic level the universe operates in ways so obscure and unfamiliar that the human mind, evolved over eons to cope with phenomena on familiar everyday scales, is unable to fully grasp "what really goes on"? Or, might it be that through historical accident physicists have constructed an extremely awkward formulation of quantum mechanics that, although quantitatively successful, obfuscates the true nature of reality? No one knows. Maybe some time in the future some clever person will see clear to a new formulation that will fully reveal the "whys" and the "whats" of quantum.

[…]“At this point your classical upbringing is balking: How can one electron simultaneously take different paths—and no less than an infinite number of them? This seems like a defensible objection, but quantum mechanics—the physics of our world—requires that you hold such pedestrian complaints in abeyance. The result of calculations using Feynman's approach agree with those of the wave function method, which agree with experiments. You must allow nature to dictate what is and what is not sensible. As Feynman once wrote, "[Quantum mechanics] describes nature as absurd from the point of view of common sense. And it fully agrees with experiment. So I hope you can accept nature as She is—absurd."

[…] “Niels Bohr, one of the central pioneers of quantum theory and one of its strongest proponents, once remarked that if you do not get dizzy sometimes when you think about quantum mechanics, then you have not really understood it.”

Excerpts From: Brian Greene. “The Elegant Universe.”


Brilliant !

posted Oct 30, 2017, 1:09 PM by Abhishek Ojha

One of the best books I have ever read. If you are reading this, buy and read 'Sometimes Brilliant'  The Impossible Adventure of a Spiritual Seeker and Visionary Physician Who Helped Conquer the Worst Disease in History by Larry Brilliant. The book is inspiring, simple, fabulous, a true story and at the same time too good to be reality  - stranger than fiction ! I cannot recommend it highly enough. Read it.

NORA

posted Oct 24, 2017, 1:56 PM by Abhishek Ojha

I came across this term in a conference. NORA or Non-obvious relationship awareness. It has been around for sometime, a less known but related to the buzz words of our age - data mining, machine learning, pattern recognition, big data and so on. NORA, as the name suggests, determines relationships that are not obvious. Technical part of that is boring - some unsupervised learning algorithms (data mining) and you get to see some patterns and relationships in data which are not obvious otherwise. ...but interesting is this concept of non-obvious relationships beyond data and tech.

 Awareness of what is non-obvious is sometimes more important than obvious. Like our irrational parts... sometimes they shape us more than we know. How much are we aware of our NORs? Things, places, relationships, incidents... seems like not much! 

Things that are quantifiable are easier to understand!

जीवन

posted Dec 17, 2016, 12:44 PM by Abhishek Ojha   [ updated Dec 17, 2016, 12:49 PM ]


अगर हमारे आस पास कुछ सबसे खूबसूरत है जिसे हम देख कर भी नहीं देखते वो है - जीवन ! रहस्यमयी रूप से अतिशय खूबसूरत। 

अजीब है कि हम दूसरे ग्रहों, गैलक्सी पर जीवन होगा या नहीं, होगा तो कैसा होगा वगैरह सोचते रहते है. और तब भी सिर्फ यही सोचते हैं कि वो हमसे ज्यादा विकसित होंगे या नहीं। उनके दो पैर, दो आँखें होंगी या नहीं। हम ये शायद ही कभी सोचते हैं कि धरती पर ही जीवन इंसानों से बहुत आगे, बहुत विविध और खूबसूरत है. हम कभी सोचते हैं कि पौधे ,जानवर,धरती पर, समुद्र में जो जीवन है... वो भी चतुर और समझदार जीवन है? माइक्रोऑर्गेनिज्म छोड़ दें तो भी कितने जीव, कितनी विविधता - अद्भुत सहयोग और संतुलन। जैसे हम अपने अंदर देखने की वजाय बाहर देखते हैं वैसा ही कुछ है. अपने महासागरों के अंदर कितना जीवन है उससे ज्यादा हम सौरमंडल के अन्य ग्रहों के बारे में जानते हैं. दार्शनिक होने जैसी बात नहीं है - बहुत साधारण सी बात है. इतनी सी बात है. इतनी सी की हमें दिखती ही नहीं। नजर घुमा के हम देखते ही नहीं। हाल में मैंने दो चीजें देखी - अंडर वाटर दुनिया और  रेन फारेस्ट। और फिर... पहले तो आई कैंट गेट एनफ ऑफ़ इट  फिर आई कैंट गेट ओवर इट जैसी बात हुई. मुझे नहीं लगता मैंने इससे ज्यादा खूबसूरत कुछ देखा है. वैसे कुछ दिनों में ये खुमारी भी उतर ही जानी है. पर कुछ बातें ऐसा नशा होती है जिसे हम उतरने देना नहीं चाहते। वो लम्हें जिनमें हमें लगता है... मानो संसार, ब्रह्माण्ड, जीवन का ज्ञान क्या होता है उसका एक फ्लैश सा दिख गया हो और समझ न आया हो क्या था. समझने की कोशिश में और गायब हो गया हो. विरोधाभास के बीच तारतम्य की एक झलक दिख गयी हो. हम फिर से वो देख लेना चाहते हो, फिर से वो लम्हा जी लेना चाहते हो - उसका हैंगओवर बचा रह गया हो - वैसा कुछ. 

एक सूर्य से चलता जीवन क्रम। एक जीवन के भीतर कई जीवन - एक वृक्ष के अंदर पूरा संसार। वृक्ष की जड़ में ही एक पूरा संसार। एक कोरल रीफ और उसके आस पास ही पूरा संसार - विशाल संसार - खूबसूरत - महीन संतुलन - भंगुर संतुलन - अद्भुत। एक अलग ही संसार पर बिल्कुल वैसा ही संसार ! हर संसार का अलग नियम पर सब एक ही नियम से चलते हुए जैसा कुछ.  रंग-बिरंगे-नाचते-गाते-उड़ते-तैरते-चलते-जीते-मरते-मिटते-प्रेम करते-बुद्धिमता-अनगिनत जीव-जीवन क्रम। पूरी सृष्टि मानो समरूपता और एक महीन संतुलन के अलावा कुछ नहीं। कुछ अजब सा एहसास। अजीब सा ज्ञान। अजीब सी अनुभूति- जीवन भंगुर है - नगण्य - इन्सिग्नीफिकेंट - पर खूबसूरत है - बहुत खूबसूरत।



 

Use your brain or maybe...

posted Nov 18, 2016, 8:46 AM by Abhishek Ojha   [ updated Nov 18, 2016, 11:33 AM ]

(Posted on a WhatsApp group after observing few days of Monetization debate fight - )

What's wrong with you guys !

Why can't it be a bold step and problematic for many people at the same time?
Why can't something started with good motive can have problems or even fail?

Is it too difficult to understand that real things are much more complicated than just right or wrong, awesome or terrible, black or white, Modi or Kejri.

Why can't Modi do few good things? or Why can't Kejri do? or why can't they both fuck things up?

Bhai, itna defend karne ki jagah kuchh constructive kar lo. Nahin to chill maro. Enjoy karo. kaahe lage pade ho. Jaise tumhe koi stupid dikh raha hai tum waise hi dikhte ho usko. ...because of your suporrting or opposing one person blindly. Bhakts aur Tards ke beech dhaage bhar ka fark hota hai.

Why can't you guys accept things as it is?

Why it has to be only awesome or terrible? and deciding criteria of that is only political ideology?

Do you know how you sound? As if Kejri/Modi ko support/oppose karne ke alaawa brain ke saare wire infuse ho gaye hain.  Logic start hi hota hai ek framework ke saath ki Modi ko galat prove karna hai ya use sahi prove karna hai. Uske baad jo bhi situation ho ghuma phira ke - hence proved. Biased hona is fine lekin aisa bhi kya ki mission bana liye ho ki ideology ke against kuchh achcha dikhe to sad ho jao, disaster ho to sadistic pleasure. uske baad jee jaan se lag jao kaanw kaanw karne mein.

..and do you guys think your forwarded biased articles, flawed arguments and jokes will make people change their opinion? people will listen only when you learn to speak about both pros and cons. Some of you guys are termed Bhakts or Tards... not for no reason. There is significant trend in your thinking framework... and you always crib not based on logic but based on which side you are. You think people find it logical? No !  Most people find you a politically radicalized stupid. You just make similar illogical arguments everytime, not to analyze the situation but to defend a person.  .. and adding words like rational, practical or logical to your biased framework doesn't make it any better and believe me, you only make your opponents look much better than they actually are.

Things are not as simple as one ideology or another. Economists still can't agree on the causes and reforms of biggest problems of last century - what worked, what not is still debatable after hundreds of years. Aur aap log pahle se hi sab calculate kare baithe ho. Chill guys. Rather than searching and forwarding or writing what supports Modi or Kejri or opposes them. Use your brain or maybe even that won't help...  because when you start analyzing with a given conclusion, with a biased framework, what can you conclude? better would be if you learn your biasdness and start appending it to your logical messages as a disclaimer. :)

They are politicians, whats your excuse for stupidity, propaganda warriors? Chashma utaar ke dekho achchi dikhti hai dunia. Look at facts. An unbiased estimation of fact would be somewhere close to average of NDTV and Zee TV :) and chill dunia immediately end nahin ho rahi, na awesome hi ho ja rahi hai raaton raat. 

Mental obesity hai tummein se kuchh logon ko. kuchh constructive kaam mein lagao thodi slim n sexy hogi thinking :)

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