मोबाइल फ़ोन - छठी इन्द्रिय

posted Dec 17, 2017, 3:38 PM by Abhishek Ojha

तीन छोटी घटनाएं जो फ़ोन के साथ न होने से घटित हुई और बहुत अच्छा सा लगा !  - 

पिछले दिनों हम मेक्सिको में थे. मेरा फ़ोन न इस्तेमाल करने का कोई नियम तो नहीं है पर अक्सर हम फ़ोन घर पर ही छोड़ कर बाहर चले जाते हैं. और वीकेंड पर भी फ़ोन से एक दूरी बनी रहती है. ऑफिस में रहने का समय ही ऐसा होता है जब फ़ोन बगल में पड़ा होता है. लंच के लिए भी जाते समय फ़ोन कई बार डेस्क पर छूट जाता है. पर मैं घड़ी जरूर पहनता हूँ. आदत है. पर इस यात्रा पर ... घड़ी भी नहीं थी. मेरी पसंदीदा 'सून्तो' घडी का फीता टूटा हुआ था और दूसरी घड़ियाँ  'फॉर्मल' सी हैं.  इस यात्रा पर ऐसा हुआ कि फ़ोन होटल में ही पड़ा रहता और हम बेफिक्र घूमते. अगर कहूं कि समय का अंदाजा लगता दिन में सूरज देखकर और रात में तीन दंडीयाँवाँ  देखकर तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. (तीन दंडीयाँवाँ - अर्थात तीन तारे जो एक सीध में होते हैं, और सप्तर्षि, ध्रुव तारा हम बचपन में छत पर लेटकर खूब देखते, होटल के बीच  पर रात में भी कुर्सियां पड़ी रहती तो बहुत दिनों के बाद ये भी देखा. साफ़ रात हो तो आँखें ऊपर जरूर उठ जाती हैं और दिमाग अपने हिसाब से दिशा और समय का अंदाजा लगाने लगता है). मुझे याद नहीं इससे पहले मैंने कब किसी से समय पूछा होगा... सालों बाद या शायद पहली बार किसी से पूछा - क्या समय हो रहा है. एक द्वीप से वापस आने के लिए फेरी के समय का ध्यान रखना था.  मुझे याद है बचपन में ये आम बात हुआ करती. लोग आते जाते लोगों  से समय पूछा करते. रेडिओ से घड़ियाँ मिलाई जाती. चाभी देने वाली घड़ियाँ होती (मेरे पास अब भी है) ! बिन फ़ोन, घडी बिना ये पूछना सुखद था.  क्यों? - पता नहीं ! 

एक दिन ऑफिस में एक मीटिंग के लिए एक कांफ्रेंस रूम में हम पांच लोग थे. लन्दन के ऑफिस से कुछ और लोगों कोआना था मीटिंग में लेकिन डायल करने के लिए मीटिंग की आईडी चाहिए थी. मीटिंग शुरू हुई तो पता चला हममें से पाँचों लोग अपने फ़ोन अपने डेस्क पर छोड़ आये थे ! जब ये पता चला तो कोई एक उठ कर गया अपना फ़ोन लाने. पता नहीं लोगों को कैसा लगा पर मुझे बहुत अच्छा लगा. अब भी बिना फ़ोन के लोग कुछ मिनट जिन्दा रह लेते हैं !  और आज के समय में क्या प्रोबेबिलिटी है जी कि बिना अपना फ़ोन लिए पांच लोग मीटिंग में आ जाएँ? ! 

तीसरी घटना... मेक्सिको में ही 'चिचेन इत्ज़ा' जाने के लिए हमने होटल से गाडी ली थी जिसमें कुछ और लोग थे. मैंने देखा पूरे रास्ते केवल हम थे जिन्होंने हर १० मिनट बाद फेसबुक नहीं खोला होगा. मुझे लगा पिछले चार सालों में अगर जोड़ने बैठ जाऊं तो कितने महीने हों जायेंगे जो फेसबुक पर नहीं होने से मैंने वैसे जीया जैसे जीना चाहिए. वो समय वहां गया जहाँ उसे जाना चाहिए. कितना कुछ अपने इन्द्रियों से महसूस किया फ़ोन से नहीं ! मेरी कोई इच्छा नहीं होती अब फेसबुक पर वापस आने की. लोगों को फेसबुक स्क्रॉल करते देख गर्व सा होता है. हम एक नशे से बचे हुए हैं. चार साल से अधिक हो गए और वो जैसे भी हुआ हो... बहुत अच्छा हुआ !  हाल में ही एक इटालियन फिल्म देखा था - परफेक्ट स्ट्रेंजर्स ! उसके बाद तो लगा फ़ोन दैत्य ही है !  खैर बाबा बनने का कोई इरादा नहीं है पर आप ये पढ़ रहे हैं तो कहूँगा कि फ़ोन को अपनी छठी इन्द्रिय मत बनाइये. जो इन्द्रियाँ हैं उनका भी इस्तेमाल कीजिये. दुनिया बेहतर दिखती है. समझ भी आती है. जो अपनी छुट्टियों का आँखों देखा हाल इन्स्टाग्राम किये जा रहे हैं यकीं मानिए उनकी छुट्टियां बस इन्स्टाग्राम पर ही परफेक्ट हैं !   

पर हाँ मेरे ब्लॉग अगर आप फ़ोन पर पढ़ते हैं तो वो बंद मत कीजियेगा :) :) 


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