बतंगड़ !

posted Jan 18, 2013, 1:16 PM by Abhishek Ojha
 
हम बातों का मतलब अपने अनुसार निकाल लेते हैं . हम जो सोचते हैं उसे तर्क का जामा पहनाने  लिए हम उदहारण देते हैं। ऐसे उदहारण जो हमेशा सटीक या सच नहीं होते हम उन्हें बदल कर पेश  करते हैं, अपनी सोच से उसकी व्याख्या करते हैं।  गीता, उपनिषद् और मनीषियों की कही बात को अपने तरीके से कहने के अलावा भी ... कुछ लोग साधारण सी बातों को भी ऐसे उलटे समझते और समझाते हैं कि सुनकर आप सर पकड़  लें - बात का बतंगड़ !

जैसे - अगर कोई कहे कि  हर धोखा खुबसूरत ही होता है, या धोखे अक्सर खुबसूरत होते हैं ... इसका मतलब तार्किक रूप से ये नहीं कि  जो कुछ भी खुबसूरत है तो वो धोखा ही होगा ! गणित में ए  इम्प्लाइज बी का मतलब ये नहीं होता की बी -> ए  भी होगा !  :)

वैसे ही अंत भला तो सब भला का मतलब ये तो नहीं है कि अंत बुरा तो सब बुरा ?  अंत बुरा तो भी जो भी बहुत कुछ अच्छा था वो तो था ही ! पर हम कह ही देते हैं कि  "जब जो चाहा वो हो ही नहीं पाया तो क्या कहें".... कथनो को अपने तरीके से पेश करना बात का बतंगड़ करना होता है :)

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