दूर्वांचल

posted Jan 2, 2011, 1:30 PM by Abhishek Ojha   [ updated Nov 10, 2011, 8:40 PM ]
whenever I read these lines, a specific sadness surrounds me... One of my alltime favorites by Agyeya.  The lines in italics below represents a far broader scenario of real  life than just nature. The moments which can't be repeated or recreated...

पार्श्व गिरी का नम्र, चीड़ों में
डगर चढ़ती उमंगों-सी.
बिछी पैरों में नदी ज्यों दर्द की रेखा.
विहग-शिशु मौन नीड़ों में.

मैंने आँख भर देखा.
दिया मन को दिलासा-- पुन: आऊंगा.
(भले ही बरस दिन-- अनगिन युगों के बाद !)
क्षितिज ने पलक-सी खोली,
तमक कर दामिनी बोली - 
'अरे यायावर, रहेगा याद?'
                            -अज्ञेय

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