राग दरबारी पढ़ते हुए...

posted Mar 30, 2013, 9:32 PM by Abhishek Ojha   [ updated Mar 30, 2013, 9:33 PM ]

"इससे कुछ नहीं होता, चाचा ! खन्ना मास्टर को मैं जानता हूँ। इतिहास में एम ए हैं, पर उन्हें अपने बाप तक का नाम नहीं मालूम। सिर्फ पार्टीबंदी के उस्ताद हैं। अपने घर पर लड़को को बुला-बुलाकर जुआ खिलते हैं। उन्हें ठीक करने का सिर्फ एक ही तरीका है। कभी पकड़कर दनादन-दनादन लगा दिये जाएँ। ..."

इस बात ने वैद्यजी को और भी गंभीर बना दिया, पर और लोग उत्साहित हो उठे। बात जूता मारने की पद्धति और परंपरा पर आ गयी। सनीचर ने चहककर कहा कि जब खन्ना पर दनादन-दनादन पड़ने लगें तो हमें भी बताना। बहुत दिन से हमने किसी को जुतिआया नहीं है। हम भी दो-चार हाथ लगाने चलेंगे। एक आदमी बोला कि जूता अगर फटा हो और और तीन दिन तक पानी में भिगोया गया हो तो मारने में अच्छी आवाज करता है और लोगों को दूर-दूर तक सूचना मिल जाती है कि जूता चल रहा है। दूसरा बोला कि पढे-लिखे आदमी को जुतिआना हो तो गोरक्षक जूते का प्रयोग करना चाहिए ताकि मार तो पड़ जाये, पर ज़्यादा बेइज्ज़ती न हो। चबूतरे पर बैठे-बैठे एक तीसरे आदमी ने कहा कि जुतिआने का सही तरीका यह है कि गिनकर सौ जूते मारने चले, निन्यानबे तक आते-आते पिछली गिनतों भूल जाय और एक से गिनकर फिर नए सिरे से जूता लगाना शुरू कर दे। चौथे आदमी ने इसका अनुमोदन करते हुए कहा कि सचमुच जुतिआने का यही एक तरीक़ा है और इसलिए मैंने भी सौ तक गिनती याद करनी शुरू कर दी है।  - श्रीलाल शुक्ल 'राग दरबारी' में।

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