बहुत बड़ा है यह संसार!

posted Mar 3, 2012, 1:09 PM by Abhishek Ojha   [ updated Mar 3, 2012, 1:13 PM ]

बचपन की एक और कविता :) किसने लिखा पता नहीं !

सबसे पहले मेरे घर का अंडे जैसा था आकार,
तब मैं यही समझती थी बस इतना सा ही है संसार!

फिर मेरा घर बना घोंसला सूखे तिनकों से तैयार,
तब मैं यही समझती थी बस इतना सा ही है संसार!

फिर मैं निकल पड़ी शाखों पर हरी भरी थी जो सुकुमार,
तब मैं यही समझती थी बस इतना सा ही है संसार!

लेकिन जब मैं आसमान में उडी दूर तक पंख पसार,
तभी समझ में मेरी आया बहुत बड़ा है यह संसार!



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