सुख

posted May 4, 2018, 10:50 PM by Abhishek Ojha

पिछले दिनों शहर में घूमते हुए ख्याल आया - हर किसी को उतना ख़ुश होना चाहिए जितना  इस शहर में लोग  खुबसूरत मौसम होने पर खुश होते हैं. लम्बी सर्दियों के बाद पहली बार जब तापमान २५ डिग्री के आस पास पहुँचता है. ये आश्चर्यजनक लगता है कि पूरा शहर ही अविश्वनीय रूप से खुश हो जाता है. सभी लोग खुश लगते हैं. हो सकता है कि मुझे - हरा ही हरा दीखता हो - पर लोग सच में वैसे ही खुश होते हैं - जैसे महीनों ठण्ड में बिल में छुपी गिलहरी बाहर निकल कर फुदकने लगी हो. प्रवासी पक्षी वापस आकर चहकने लगे हों - वैसे ही इंसान भी निकल आते हैं - सड़कों पर, पार्क में - हर जगह. फैशन शहर में अवतरित हो जाता है. ऐसा लगता है जैसे लोग एक अलग मानसिक स्तर पर होते हैं. लोगों के दुःख कहीं चले तो नहीं जाते होंगे पर एक अलग मन: अवस्था जरूर होती होगी. घूमते समय सभी को वैसे देख आप खुद को प्रसन्न होने से रोक नहीं सकते. जैसा प्रवाह वैसे ही तो हम भी हो जाते हैं - प्रसन्न मन !
समझ आता है कैसे सदियों पहले मनीषियों ने सूर्य को पृथ्वी पर जीवन का स्रोत बता दिया होगा. सनातन बोध ! गमले में लगे पौधों को देखकर मुझे लगता है कैसे उत्तरायण इतना बड़ा पर्व हो गया. संक्रांतियाँ कैसे बनी. हर सभ्यता में. सूर्य के उत्तरी गोलार्ध में आने से जीवन उत्तरी गोलार्ध में आया दक्षिण में जाने से दक्षिण. जीवन चहक उठता है. सुस्त पड गए धरातल पर जान फूंकने जैसा. समझ आता है कैसे होली और मदनोत्सव जैसे त्योहारों का जन्म हुआ होगा. सूर्य की पूजा शुरू हुई होगी. 

वैसे सुख परिभाषित करना इतना आसान कहाँ ! पिछले दिनों किसी ने मुझसे पूछा - तुम अपने जीवन से सुखी हो?. पहले तो ऐसे सवाल क्यों ही पूछते हैं लोग ! और इतना सोचता कौन है ? जो सुखी हूँ या नहीं पर मनन करे वो तो वैसे ही सुखी नहीं रहेगा ! मैंने कहा इस सवाल का जवाब हाँ या ना तो नहीं हो सकता हां मुझे लगता है कि अक्सर मैं खुश रहता हूँ. बाद में ये भी लगा कि मैंने कहीं लिखा था - अगर कभी मौका मिले जीवन में वापस जाकर कुछ बदल पाने का और आप कुछ न बदलें तो आप सुखी हैं. अगर उस हिसाब से सोचूँ तो मैं अपने को सुखी वाले साइड ही पाता हूँ.  खैर... 

खैर... उसी खुबसूरत मौसम वाले दिन. शाम को हम अपनी पसंदीदा जगह गए. नदी का किनारा. पानी के ऊपर बना एक पार्क और उसके पीछे शहर का स्काईलाइन. खुबसूरत जगह है. प्रकृति और कृत्रिम का अद्भुत संगम.  जब मौसम अच्छा हो तो हम शाम को वहीँ पाए जाते हैं. लोगों का आना जाना - सब कुछ बहुत सुकून भरा होता है. दिन का खुबसूरत समय. (जब जब मौसम अच्छा हो).वहां एक ग्रुप है जो अक्सर डांस करता है. दर्जन भर लोग होंगे. चाइनीज हैं या कोरियन मुझे नहीं पता. पर अच्छे मौसम में वो अपनी धुन में डांस करते मिल जाते हैं. एक छोटा सा क्लिप भी है पिछले साल का इस लिंक पर.

जो लीडर हैं वो काला चश्मा जरूर पहनते हैं ! बिना किसी की परवाह किये अपनी धुन में मस्त. उनमें से लगभग कोई अंग्रेजी नहीं बोलता. ...उस दिन कुछ ख़ास हुआ. एक लड़की आई और उसने 'लीडर' से कहा कि उसे उनका डांस बहुत पसंद है. उसने अपने फ़ोन में  पिछले साल की रिकोर्डिंग भी दिखाई.  और दिखाकर कहा कि मुझे इस वाले गाने पर आप लोगों के साथ डांस करना है. 

उस समय जो मैंने देखा - उसे ख़ुशी कहते हैं. उस क्षण को ! लीडर के चेहरे पर जो भाव था उसे ख़ुशी कहते हैं. वो लगभग दौड़ कर अपने ग्रुप से दो औरतों को बुला कर लाया. मुझे भाषा तो नहीं समझ आई पर इतना समझ जरूर आया कि - 'देखो, देखो मैं कहता था न कि हम बहुत अच्छा डांस कर रहे हैं. बताओ बताओ ये लड़की क्या कह रही है?' जैसा कुछ कहा. उतनी ख़ुशी ऑस्कर जितने वालों को नहीं होती होगी. निश्छल. अद्भुत सा. 


फिर पता चला कि उन्हें भी ये पता है कि हम अक्सर बैठकर देखते हैं  उन्हें. उन्हें झुककर हमारा भी अभिवादन किया - थैंक यु, थैंक यू कहा. पर उस एक पल वो इंसान जितना खुश था भगवान सबको उतना खुश रखें :)

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