बक्से में बंद लोग !

posted Aug 12, 2016, 5:00 PM by Abhishek Ojha   [ updated Aug 12, 2016, 5:01 PM ]

मैं कितना रॉ-रफ-खांटी टाइप इंसान हूँ, मुझे नहीं पता. बाकी लोग बता सकते हैं. पर मैं अक्सर ऐसे लोगों से मिलता हूँ जो रेफ्रिजरेटर में रखे फल की तरह होते हैं. पांच मिनट बाहर रहे तो कभी गर्मी लगने लगती है, कभी सर्दी। (वैसे मेरे लिए भी ऐसा ही कहने वाले लोग हैं तो मैं ऐसे लोगों के बारे में कुछ बुरा नहीं कह रहा). शायद मैं भी कहीं ऐसा ही हूँ. पर कई लोग मन से हाइपर होते हैं. तूफ़ानी ! थोड़ा सा कुछ हुआ तो सारा आसमान सर पर उठा लेंगे। अफरा तफरी मचा देंगे। 

 ऐसे लोगों की पैनिकता देख हंसी आ जाती है. आप खुद भी फंसे हुए हो तब भी उन्हें देख हंसी आ जाती है. जब २०१५ में नेपाल में भूकंप आया था तब मैं भारत में था. जहाँ था वहां भी बहुत देर तक झटके आये थे. कई लोग हाइपर हो गए थे. बिन सोचे इधर-उधर भागना. और कुछ लोग... शांत। तुम इधर आ जाओ, तुम उधर से आओ. खुद शांत और दूसरों की मदद करते हुए. घबराहट सबको होती है, भय सबको लगता है पर एक जैसा नहीं। पैरों तले जमीन हिल जाना क्या होता है वो उस समय पता चला था. तो ऐसा नहीं कि हमें डर ही नहीं लगा पर पता नहीं बाकी लोगों को देख या थोड़ी खुली जगह में था या जो भी कारण रहा हो... मैं शांत वाले लोगों में था. 

अभी कुछ दिनों पहले कुछ मिनट के लिए आंधी आयी. स्विमिंग पूल के किनारे लगी एक छतरी उड़ गयी... उसके बाद एक और उड़ गयी. उस समय मैं स्विमिंग पूल में था. कई और लोग भी थे. अफरा तफरी मच गयी. कुछ लोग ऐसे भयभीत हुए जैसे साढ़े पांच फुट गहराई वाले पूल में डूब ही जाएंगे। मैं इधर उधर देखता रहा कि ऐसा क्या हो गया ! मुझे हंसी आयी... बचपन में आंधी में आम के पेड़ों के नीचे हम चले जाते। या बगीचे से थोड़ी दूर खड़े रहते और जैसे ही हवा कम होती हम आम उठाने चले जाते। आंधी-पानी में लोगों के कच्चे घर गिर जाते। पेंड तो खैर गिरते ही. मुझे लगा उन लोगों को यहाँ ले आओ तो... क्या है यहाँ गिरने का ? उन्हें भरोसा होगा कि यहाँ आंधी में किसी को चोट लग सकती है ? पर यहाँ इतनी व्यवस्था के बावजूद सच में चोट लग भी जाती है ! मैंने बाहर निकलकर एक छतरी को संभालने की कोशिश की तो एक दो लोग और भी आ गए. .. हालात कुछ ऐसे हो गए थे- Kid scared of drowning

दुनिया में हर मामले में एक छोर से दूसरा छोर देखना चाहिए। जिंदगी हर छोर देखने का मौका दे... छोटी छोटी बातों में बहुत कुछ दीखता है. बहुत। बहुत कुछ सीखने को मिलता है. कई बातों से गर्व हो जाता है तो कई बातों से लगता है हम कुछ हैं ही नहीं ! एक बात है - जितना अधिक हम देखें उतना विनम्र होते हैं - हम कुछ नहीं !


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