Smoothing

posted Apr 9, 2015, 12:46 PM by Abhishek Ojha

"ऐसा भी कभी होता है?"

अक्सर फिल्में देखते और कभी-कभी पढ़ते हुए ये खयाल आता है। 
कुछ चरित्र और घटनाएँ ऐसे होते हैं कि.. बिल्कुल आदर्श या बिल्कुल अभिशप्त, बहुत बुरे या बहुत अच्छे... एक्सट्रीम हम उनकी कुछ बातें अपने से जोड़ पाते हैं कुछ नहीं। कुछ चरित्रों को हम बिलकुल अपने करीब पाते हैं तो कुछ को अविश्वसनीय। 

वैसे ही कुछ घटनाएँ... हमें लगता है ऐसा हो ही नहीं सकता तो कुछ के लिए लगता है ऐसा ही तो होता है ! शायद ये सोचना हमारे खुद के अनुभवों पर निर्भर करता है। जैसे जो कहते हैं ... 'कम से कम इतनी सैलरी तो होनी चाहिए, इससे कम में काम चलना मुश्किल है' इसका मतलब है उनकी इतनी तो होती ही है !  वैसे ही अनुभवों का है। 

कल... प्यार का पंचनामा देखा। कितनी बार सोचा ऐसा कभी नहीं होता तो कई बार ये भी सोचा बिलकुल ऐसा ही होता है . कई बार लगा शायद होता होये सोच के झोले अनुभव के साथ बदलते रहते हैं। समय के साथ कई बातें ऐसा कभी नहीं होता के झोले से निकल ऐसा ही होता है के झोले में आ गिरती है। तो कई दूसरी तरफ भी चली जाती है। ऐसा होते रहना चाहिए। 

किसी ने पूछा - तुम इनमें से किसकी तरह हो? मुझे लगा - हूँ तो मैं इनमें से किसी की तरह नहीं !
फिर यही खयाल आया जो ऊपर लिखा है। मैंने कहा - इट्स लाइक स्मूथिंग। एवरेज कर देना। सांख्यिकी में जैसे होता है न - Smoothing  वैसे ही। हर व्यक्ति अलग-अलग है. सोचने (लिखने) वाले अपना-अपना अनुभव-एल्गॉरिथ्म लगा कर स्मूद कर चरित्र और घटनाएँ गढ़ते हैं। पूरी तरह नहीं पर कभी कभी हम उस स्मूद कर्व पर आ जाते हैं ! अलग-अलग घटनाओ और चरित्रों का औसत। मैं भी वहीं कहीं हूँ... घटनाओ और चरित्रों का औसत। कुछ बातों के लिए एक्सट्रीम के करीब... वहीं कहीं चरित्र-घटना के ग्राफ पर। किसी के जैसा नहीं और सबके जैसा.

किसी ने कभी इस फिल्म के लिए कहा था - सिर्फ ट्रेलर देखा था। मैं ऐसी गंदी फिल्में नहीं देखती। :) 

खैर.. आई एम गोइंग  (ऑल्मोस्ट) ऑफलाइन फॉर रेस्ट ऑफ द मंथ। 

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