धर्म

posted Jun 3, 2013, 2:36 PM by Abhishek Ojha

...पैगम्बरों और धर्म-प्रवर्तकों की प्रत्येक उक्ति को स्वतः प्रमाण मानकर चलने से मनुष्य की बुद्धि कुंठित होती है. जैसे इतिहास, विज्ञान आदि विद्याओं में कोई भी बात बस इसलिए सत्य नहीं मानी जाति कि किसी महाविद्वान ने उसे कहा है, उसी प्रकार, धर्म में कोई भी बात केवल इसलिए सत्य नहीं मानी जानी चाहिए कि  वह वेद , कुरान या बाइबिल में लिखी हुई है। धर्म का भी एक पक्ष बुद्धि और विचार का विषय है तथा जो बात बुद्धि में नहीं आती हो, उसे नहीं मानना ही धर्म है। अँधा होकर किसी प्राचीन विचार से चिपके रहने की अपेक्षा शंकालु होकर धार्मिक सत्यों का शोध करने को राधाकृष्णन धार्मिकता का अधिक श्रेष्ठ रूप मानते हैं। उन्होंने कई स्थानों पर बुद्ध के इस वचन को दुहराया है की मेरे वचनों को इसलिए मत मानो कि  उन्हें मैंने कहा है, बल्कि इसलिए कि  वे तुम्हारी बुद्धि से भी मान्य हैं।
                                                                                               - रामधारी सिंह 'दिनकर' संस्कृति के चार अध्याय में
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