ग़ालिब

posted Jan 21, 2011, 3:43 PM by Abhishek Ojha   [ updated Nov 10, 2011, 8:36 PM ]
in a different mood today, So just a few good ones from Chacha Ghalib:

मिहरबां हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़त
मैं गया वक़त नहीं हूं कि फिर आ भी न सकूं.

ज़हर मिलता ही नहीं मुझ को सितमगर वरना
कया क़सम है तिरे मिलने की कि खा भी न सकूं.

क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूं
मैं जानता हूं जो वह लिखेंगे जवाब में.

And a different one:

अपनी हस्ती  ही से हो जो कुछ हो
आगही गर नहीं ग़फ़लत ही सही.


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