धन के उपयोग पर शुक्राचार्य

posted Jan 14, 2011, 8:04 PM by Abhishek Ojha   [ updated Nov 10, 2011, 8:37 PM ]

This one noted down from Shrimadbhagwat puran in my diary...  during one of the holidays spent at home.  

धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च.
पञ्चधा विभजन्वित्तमिहामुत्र च मोदते. 
                                            - श्रीमद्भागवत (अष्टम स्कंध, अध्याय: १९, श्लोक:३७)

शुक्राचार्य ने राजा बलि से कहा:  जो मनुष्य अपने धन को पांच भागों में बाँट देता है - कुछ धर्म के लिए, कुछ यश के लिए, कुछ धन की अभिवृद्धि के लिए, कुछ भोगों के लिए और कुछ अपने स्वजनों के लिए - वही इस लोक और परलोक 
दोनों में सुख पाता है.

One who  divides his wealth in five parts for religion, reputation, opulence,  fulfillment of a desires  and his family members, is happy in this world and in the next.

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