वयं रक्षाम: पढ़ते हुए

posted Jun 19, 2014, 5:25 PM by Abhishek Ojha   [ updated Jun 19, 2014, 5:25 PM ]

रामायण की तुलना में महाभारत मुझे हमेशा रोचक लगा है।  शायद इसलिए कि  हम सभी अपने को महाभारत के पात्रो और घटनाओं से जोड़ पाते हैं। हर एक पात्र और घटनाएं इतनी वास्तविक, जटिल, रोचक और विस्तृत हैं कि… हम एक पर ही सोचते रह जाएं। या शायद इसीलिए भी कि  'यूँ होता तो' जैसी घटनाएं भी महाभारत में भरी पड़ी हैं। हम सबके जीवन में भी ऐसी घटनाएं होती ही रहती हैं. वयं रक्षामः पढ़ते हुए.… राम के वनवास का छोटा सा प्रसंग आया है...  उसे पढ़ते हुए लगा.… 

1. "पुत्र मैंने इस दीर्घायु से बहुत अनुभव पाया। संसार का मुझे यथावत ज्ञान है. प्रत्येक बात का मुझे पूरा अनुभव है। मैं अब एक क्षण का भी बिलम्ब इस कार्य में नहीं करूँगा। कल ही मैं यह शुभ कार्य पूरा करूँगा। मनुष्य के विचार सदैव एक से नहीं रहते, उनमें परिवर्तन होता ही रहता है।  इससे मैं अब अधिक सोच-विचार में समय नष्ट नहीं करना चाहता।  इसीसे मैं निश्चय ही कल यह काम पूरा करूँगा। ….” 

अनुभव? अनुभव अक्सर बाँझ होते हैं. उनसे सिर्फ ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं, किसी और को ज्ञान दिया जा सकता है. 

2. कैकेयी मंथरा से - "इसमें दुःख और शोक की क्या बात है भला? मैं तो भरत और राम में भेद नहीं समझती। राम और भरत दो नेत्र हैं।  राम का राज्याभिषेक हो रहा है तो मैं प्रसन्न हूँ।  यह तो शुभ समाचार है।  ले यह रत्नहार, ये सब आभूषण, मैं तुझे पुरस्कार में देती हूँ।”

ये समझ बनी रहती तो?। आवेश में अच्छे-अच्छे मूर्खता कर बैठते हैं।   

3.  दशरथ कैकेयी से -  "देख मैं दीन की भांति तेरे चरणों पर गिरकर तुझसे भीख मांगता हूँ की तू इस भयानक निश्चय को बदल दे”. 

गिड़गिड़ाने और दीनता दिखा कर सत्य और भलाई की बात कहने की बिडम्बना है कि उसमें सामने वाले को स्वार्थ दीखता है !  उसका अहंकार इस दीनता को कभी देख नहीं पाता बदले में तिरस्कार ही मिलता है… वही होना था - "मैं तो आज ही विष पान कर प्राण दे दूंगी। … मैं भरत की शपथ खाकर कहती हूँ कि मैं किसी भांति और दूसरे उपाय से संतुष्ट नहीं हो सकती।”

4. दशरथ - "दूर देश से जो राजा आये हैं, वो क्या कहेंगे! अब मैं कैसे मैं उन्हें मुंह दिखा सकता हूँ ! अरी कुछ तो सोच, कुल की प्रतिष्ठा और राम की ओर देख.”

परन्तु जैसे सुखा काठ मोड़ा नहीं जा सकता, उस प्रकार कैकेयी पर इन बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा. 

5.... राम को वन जाना पड़ा।  दुःख, क्षोभ और ग्लानि से दशरथ ने प्राण त्यागे। भरत ने राम को लौटाने के बहुत प्रयत्न किये, पर सफल न हुए. 

कहते हैं कैकेयी खुद गयी थी राम को लौटा लाने।  (ये कविता देखें पसंद आएगी) 

अगर दशरथ रुक गए होते कुछ दिन तो ? क्या कैकेयी को खुद समझ न आती ये बात? 

कैकेयी ही कौन सा ये चाहती थी? गुस्सा, आवेश या जो भी क्षणिक था क्या शांत नहीं हो जाता? अनुभव, समझ क्या कमी थी आखिर?

कोई तो ऐसा नहीं था जो चाहता हो कि राम युवराज ना बनें?

बिडंबना? 

और अंत में.… उस समय भला किसने सोचा होगा कि "जो होता है अच्छे के लिए ही होता है !" :)

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