निर्मल वर्मा को पढ़ते हुए -

posted Mar 26, 2015, 1:16 PM by Abhishek Ojha   [ updated Mar 28, 2015, 9:28 AM ]
निर्मल वर्मा की ये दूसरी किताब पढ़ रहा हूँ। पहली को पढ़ते हुए ही लग गया था कि उन्होने मानवीय भवानाओं और रिश्तों को बड़ी सूक्ष्मता से देखा है। पर कल एक पंक्ति पढ़ते हुए लगा - "ये ऐसे ही तो नहीं लिखा जा सकता!"। ठीक वैसा ही जैसा शहरयार को पढ़ते हुए लगा था। मेरे मानना है कि कुछ भावनाएँ जब तक कोई स्वयं जी ना लें, वैसे शब्दों में नहीं लिख सकता। बिन अनुभव कोरी विद्वता की लेखनी वैसी नहीं हो सकती। जब भी मुझे ऐसी पंक्तियाँ पढ़ने को मिलती हैं जिन्हें पढ़ते ही कुछ महसूस होने लगता है, एक अजीब उदासी, एक अजीब सी हुक उठती है, दिल सिहर सा जाता है। या जब पढ़ते हुए आंखो में एक मासूम सा निश्चल उल्लास अनायास ही झलक आता है। कहीं ना कहीं जब लगता है कि हमने भी वैसा कुछ महसूस किया है तब... तब लगता है कि कहानी का ये हिस्सा लिखने वाले ने सिर्फ लिखा नहीं... भोगा है, खुद जीया है.. मानो उन जी चुके पलों को याद करते हुए एक ट्रांस स्टेट में जाकर लिख दिया हो. एक प्रवाह में उड़ेल दिया हो उसने अपना भोगा हुआ सच। पन्नों पर शब्द और भावना एक दूसरे में घुले दिखते हैं। कहीं-कहीं पढ़ते हुए शब्दों का अस्तित्व खत्म हो जाता है और शेष रह जाती हैं सिर्फ भावनाएँ ! जैसे भक्ति में लीन किसी भक्त ने अपने भगवान को महसूस करते हुए लिखा हो, या किसी टूटे हुए इंसान ने घोर यातना के क्षणो को याद करते हुए लिखा हो। जैसे एक मिठाई हो... और पढ़ते हुए हम शब्द वैसे ही भूल जाएँ जैसे मिठाई खाते हुए ये कि वो किसने और क्या-क्या मिला कर बनाई है। 

निर्मल वर्मा के व्यक्तिगत जीवन के बारे में बहुत ज्यादा नहीं मिला इंटरनेट पर। हाँ जो सोचा था उतना मिल गया... चेकोस्लोवाकिया में प्रवास के दौरान बंगाली डॉक्टरिन बकुल से प्यार, शादी। ...बच्ची के तीन साल के होने तक में ही तलाक... फिर सब कुछ होते हुए भी रहने वाला एक अकेलापन। ... भारत वापसी पर अपने से तकरीबन तीस साल छोटी लेखिका से दूसरी शादी। साधारण प्रसन्न व्यक्तित्व से असाधारण जटिल हो जाने वाला बदलाव  ...बहते जल में आ जाने वाला ठहराव। खुशी का भ्रम समझ लेने वाले इंसान की बेवसी... एक निरर्थकता।  वो अभिशप्त-पवित्र ज़िंदगी जिसमे "अच्छे" लोग घुटन के बाद अपने अंदर का एक कमरा हमेशा के लिए बंद कर लेते हैं - वो हिस्सा जो वो खुद भी नहीं टटोलना चाहते ! 

 उनके शब्द उनके अंदर के उस बंद कमरे का प्रतिबिंब दिखाते रहते हैं... 

अज्ञेय ने लिखा है - 'दुःख सब को माँजता है और - चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने , किन्तु- जिन को माँजता है उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रखें।'
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