समझ !

posted Jul 7, 2016, 3:08 PM by Abhishek Ojha   [ updated Jul 7, 2016, 8:35 PM ]

बात इस ट्वीट की - "जो समझदार हैं उन्हें समझाने की जरुरत नहीं. जो मुर्ख हैं उन्हें समझा के भी कुछ नहीं होना. और इन दो छोरों के बीच वाले बहुत कम ही होते हैं !"

- "जो समझाने से समझ जाते हैं वे समझदार और समझ कर भी नहीं समझते वे मुर्ख ! और जो समझ और ना समझी के बीच में झूलते झूलते समय गँवा देते वो कौन.?"

मेरी इतनी समझ नहीं की इन बड़ी बातों पर बात करूँ पर जो मुझे लगता है वो कहने की कोशिश कर रहा हूँ. इस अल्पज्ञता को अपनी समझ से समझा जाय :)

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जो समझ और नासमझी के बीच में झूलते झूलते समय गँवा देते हैं उन्हें मैं समझदार ही कहूँगा. क्योंकि वो अगर समझ वाले छोर तक जा पा रहे हैं तो वे (आज नहीं तो कल) उस छोर पर ही कन्वर्ज होंगे. नहीं भी हो पाए तो उनका झुलना ही ये दर्शाता है कि उनमें लचक है - फ्लेक्सिबिलिटी. और जिसमें ये हो वो मुर्ख नहीं हो सकता.

नासमझ मुर्ख नहीं होते. मुर्ख वो होते हैं जो अपनी समझ के परे कुछ न सुने - स्टबर्न - रिजिड - पत्थर.

भर्तृहरि इसे सबसे अच्छे से समझाते हैं -

अज्ञ: सुखमाराध्य: सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञ:, ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि च तं नरं न रंजयति॥
नासमझ को समझाना आसान है, ज्ञानी को समझाना और भी आसान है, पर अल्पज्ञान से खुद को विद्वान मान लेने वाले अल्पज्ञ को आप क्या ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते (या खुश कर सकते).

ये होता है मुर्ख टाइप - १.

और दूसरा -
प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरवक्त्रदंष्ट्राब्तरात्, समुद्रमपि सन्तरेत् प्रचलदूर्मिमालाकुलम्। भुजंगमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद् धारयेत्, न तु प्रतिनिविष्ट-मूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥
मगरमच्छ के दांतों के बीच से मणि निकाली जा सकती है , उफ़नते समुद्र को भी तैर कर पार किया जा सकता है। कुपित नाग को सिर पर पुष्प माला की तरह पहना जा सकता है। किन्तु मूर्ख चित्त को समझाया नहीं जा सकता.

और एक फेवरेट -
लभेत सिक्तासु तैलमपियत्नत: पीडयन् पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दित। कदाचिदपि पर्यटन् शशविषाणमासादयेन्न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाअराधयेत् ॥
संभव है रेत से भी तेल निकाला जा सकता हो, मरीचिका से मृग की प्यास बुझ सकती हो, शायद किसी पर्यटक को किसी खरगोश के सिर पर सिंग भी दिख जाए पर किन्तु मूर्ख की मानसिकता का कुछ नहीं किया जा सकता.

चाणक्य ने भी लिखा है - मुर्ख को उपदेश देने से मुर्ख का क्रोध बढ़ता है और उपदेशक को दुःख होता है.

भर्तृहरि के मुर्ख वो छोर है जो समझ नहीं सकते - बुद्धू छोर. इसका उल्टा वो जो सब समझ जाए - बुद्ध  छोर!

मुझे लगता है कि जो सुनता है, देखता है, समझता है... जो भर्तृहरि और चाणक्य का मुर्ख नहीं है - वो मुर्ख है ही नहीं. कोई कितना भी नासमझ हो अगर उसकी समझ बीते हुए कल से आज बेहतर हुई  है... अपनी गलतियों से सीखता है, उन्हें फिर से नहीं दोहराता तो फिर उससे समझदार कोई नहीं ! ओकेजनल मुर्ख मुर्ख नहीं होता :) वो आज न कल सीख ही जाएगा. क्योंकि कभी कभी ही सही उसकी आँखे खुलती हैं.

छोर की बात करें तो बुद्ध होना तो पूर्ण हो जाना हुआ, विरले होते हैं. चाँद का उदहारण लें तो बढ़ते बढ़ते पूर्णिमा का चाँद हो जाना पूर्ण हो जाना हुआ. पर उसके बाद तथागत हो जाना होता है (तथागत यानी बढ़ने घटने की कला से परे). नहीं तो पूर्णिमा के बाद फिर एक ही रास्ता बचता है वहां से घटने का ! ज्ञानी होकर तथागत नहीं हुए तो फिर घटने लगेंगे. अहम् जैसा कुछ? तो मुझे लगता है कि समझ के स्केल पर अगर कोई अमावस्या नहीं है - तो फिर वो मुर्ख नहीं है, वो समझदार ही है. दूज का चाँद है तो उसे वहां से उत्तरोत्तर बढ़ना ही है ! समझदारी में, खुशी में - पूर्णिमा का चाँद होना मायने नहीं रखता (मिथ है). मायने रखता है शुक्लपक्ष का चाँद होना. यानी क्रमशः बढ़ने वाला होना. बस अल्पज्ञान से खुद को उसी अवस्था में विद्वान मान कर अँधा हो जाने वाला न हो.

तो मुर्ख बस तो तरह के हुए. एक जिनको उनकी समझ के परे कुछ समझाया नहीं जा सकता - शून्य, अमावस्या. और दुसरे अल्पज्ञ जिनको थोडा ज्ञान तो होता है पर उन्हें लगता है उन्हें सब आता है. ये दोनों निकाल दें तो जो भी बचा मेरे हिसाब से वो सभी समझदार हैं.

साईकोलोजी में एक डनिंग-क्रूगर इफ़ेक्ट होता है. उसका एक अर्थ ऐसे निकलता है - अल्पज्ञ दुहरी समस्या से पीड़ित होते हैं. सोच कर भी ना सिर्फ वो गलत निष्कर्ष निकालते हैं और गलतियां करते रहते हैं बल्कि उनकी अक्षमता (इनकमपीटेंस) उन्हें ये कभी महसूस भी नहीं होने देती कि वो गलत कर रहे हैं - अब वो भला कैसे सीख पायेंगे? अगर वो समझ पाते कि वो कहाँ गलत हैं तो वो मुर्ख नहीं रह पाते। पर वो कितना भी सोच लें उन्हें उनके हिसाब से सब ठीक ही दीखता है. दूसरों की सुनते नहीं हैं... जीवन भर एक ही काम करना हो तो भी वो उसे उसी तरीके से करते रह जाते हैं.  जैसे जीसस ने अपने हत्यारों के लिए कहा - "भगवान इन्हें माफ़ करना क्योंकि इन्हें नहीं पता ये क्या कर रहे हैं". उनके हत्यारे गलत निष्कर्ष पर पंहुच कर न सिर्फ जघन्य काम कर रहे थे उन्हें ये पता भी नहीं था कि वे ऐसा कुछ कर रहे हैं ! अगर जो समझ और नासमझ के छोरों के बीच झूलता रहता है वो भले एक दो बार मुर्खता वाला काम कर जाए... उसे कभी तो रियलाइज होगा कि उसने मुर्खता वाला काम किया. अगर वो होता है तो फिर वो धीरे धीरे ही सही समझ जाएगा.  ऐसे लोगों में से कुछ तो बोपदेव - कालिदास तक बन जाते है. :)

और... समझ तो बदलती रहनी भी चाहिए. झूल तो हम सभी जाते हैं कभी कभी. झुलना चाहिए भी.  बने बनाए विचार तो ध्वस्त होते ही रहने चाहिए. बेहतर सच की समझ तो हमें होती ही रहनी चाहिए. सच की ही तरह समझ भी अनेकान्तवाद वाली चीज है. अगर हम समझ क्लासिकल फिजिक्स तक ही रखें तो क्वांटम तक कैसे पहुचेंगे? जैसे उम्र के हर पड़ाव पर लगता है कि अब जाके समझ आया जिंदगी होती क्या है ! वो चाहे एक किशोर हो या वृद्ध दोनों को ही लगता है उन्हें समझ है जिंदगी की. वही किशोर जब वृद्ध  होता है तो कहीं न कहीं उसकी पुरानी मान्यता बदल कर नयी समझ बनी - तो वो समझदार हुआ. पर वही अगर अपनी अल्पज्ञता में अपने को विद्वान समझ वहीँ रुक जाए, या भर्तृहरि के मुर्ख की तरह कुछ देखे-सुने-सीखे ही नहीं फिर वो मुर्ख हुआ.

संक्षेप में - अंतर बस ये है कि समझ में फ्लेक्सिबिलिटी होनी चाहिए, विस्तार होना चाहिए.

बस :)
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