पुरानी किताबें

posted Sep 1, 2016, 7:09 PM by Abhishek Ojha   [ updated Sep 2, 2016, 7:51 AM ]

स्कूल के दिनों में एक बाजार लगता. (रांची में). अब भी लगता हो शायद। मुझे याद है क्योंकि एक बुड्ढा आदमी वहां किताबें बेचता था. हर मंगलवार को लगने वाले बाजार में वैसे तो सब्जी के अलावा भी बहुत कुछ बिकता पर किताब की अकेली 'दूकान' लगती. रद्दी में से खरीदी गयी किताबें. रादुगो प्रकाशन मास्को से लेकर १९२१ में छपी केमिस्ट्री की किताब. पचास साल पुरानी ट्रिगोनोमेट्री की किताब से लेकर रसियन फिजिक्स और कैलकुलस की किताबें. गोरखपुर विश्वविद्यालय के लाइब्रेरी का स्टैम्प लगी १९५२ की डिफ़रेंशियल कैलकुलस. २ रुपये में मधुशाला. ३ रुपये में अनाम दास का पोथा. कई किताबें सब्जी के भाव खरीदी हमने. वो पहला परिचय था पुरानी किताबों से. सिलेबस के बाहर और  'उस जमाने' में किताबे कैसी होती थी का शौक. पन्नों पर स्याही से लिखे नोट्स. किताब खरीदने की रशीद. सामान खरीदने की रशीद। पहले पन्ने पर 'सप्रेम'. मूल्य: पंद्रह पैसे ! 

कुछ किताबें जो ज्यादा खराब हो गयी होती उनका कवर और कुछ पन्ने हटा कर वो वृद्ध वैसे ही फ़ेंक देते जैसे किताब नहीं पत्ता गोभी हो ! 
उन्हें कुछ नहीं पता होता था उन किताबों में क्या होता.  ये भी नहीं पता होता कि कितने में कौन सी किताब बेचनी है. देखने में बाइंडिंग अच्छी हो और भारी भरकम हो तो महँगी. 

'इसमें तो कुछ नहीं है बस मोटी है किसी काम की नहीं'. 
'अच्छा ? ऐसा है? इतनी मोटी है ! अच्छा चलो ५ रूपये में ले लो.'
'नहीं... मेरे काम की नहीं है. मैंने ऐसे ही कहा.'
'सुनो सुनो ३ में ले लो.' 

उस कचरे में से चुन बहुत सी किताबें ले आते हम. 

कई सालों बाद.... एक युग बाद. 

कुरंट मैथेमेटिकल इंस्टिट्यूट, न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी के सामने सड़क पर थोड़ी थोड़ी दूर पर तीन-चार किताब की 'दुकाने' थी - सड़क की दुकाने। खाट पर लगी हुई. बाजार वाले 'दुकान' की तरह.. उनमें से एक दूकान पर रुक गया. एक वृद्ध दंपत्ति. एक पुरानी गाडी, चार फोल्ड होने वाले टेबल जिन पर किताबें रखी थी. वृद्ध किताबें चुन चुन कर उन्हें जिस टेबल पर होना चाहिए वहाँ रख रहे थे. वृद्धा पीछे कंक्रीट की बेंच पर बैठी थी. इस शहर में वृद्ध दंपत्ति कभी कभार ही दीखते हैं. ये बात सोची जाए तो कहा जा सकता है कि दीखते ही नहीं हैं ! शायद इसलिए वहाँ रुका क्योंकि वहां रखी बहुत सी किताबें मेरी पढ़ी हुई थी. बाकी ऐसी जिन्हें पढने के लिए सोच रखा है. उससे जो बची.. वो लगा मैंने नाम नहीं सुना पर अद्भुत किताब है. मुझे भरोसा नहीं हुआ कि ये बस ऐसे ही रख दी गयी हैं. हम किताबें पलटते रहे. मुझसे नहीं रहा गया. मैंने उनसे पूछा कि आप किताबें चुन चुन कर लाते हैं? ऐसा कैसे हो सकता है यहाँ हर किताब ही पढने लायक है? 

उन्होंने मुस्कुराते हुए धन्यवाद दिया और कहा - 'हम कोशिश करते हैं.' 
'आपने सब पढ़ी है?' 
'हम कोशिश करते हैं'.  उन्होंने फिर से वही जवाब दिया.

फिर किताबों की बात... किन्डल, किताबें संभाल कर रखना.. कैसे आते हैं, कहाँ रहते हैं. रोज आते हैं? वगैरह बातें हुई. 
'मौसम आने लायक हो तो आते हैं.' हम यहीं मिलते हैं. 

मैंने दो किताबें ली. चेखोव की एक ३ डॉलर में जिस पर कीमत छपा था १.४५ 
१०.९५ के गेब्रियल मर्क़ुएज़ मिले ५ में!

मैंने अपने आप से कहा - जब समझ नहीं आये अब कौन सी किताब पढनी है तो यहाँ आकर कोई भी किताब उठा लेना - सोचने का काम किसी ने पहले ही कर रखा है. 

एक किताब पलटते ही दिखा - पहले पन्ने पर लिखा बहुत प्यारा सन्देश। बहुत ही प्यारा। किसी ने बड़े प्यार से किसी को किताब दी होगी। पता नहीं कैसे किसी ने बेच दिया होगा उस किताब को ! पता नहीं कहाँ कहाँ होते हुए आज यहाँ पड़ी है. अब कहाँ जायेगी। देने वाले ने सोचा होगा कि एक दिन ऐसे यहाँ पड़ी होगी वो किताब ? सन्देश, नाम, दिनांक रह गये हैं. बाकी सब बदल गया शायद। दिमाग को शायद समझ नहीं आया कौन सी बात स्वीकारे- 'ऐसे किताबें बेच देने वाले दुनिया में बने रहे' या 'ऐसे कैसे लोग होते हैं जो किताबें बेच देते हैं'? वो सन्देश वाली किताब मैं ले नहीं पाया। 

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