कलगी बाजरे की (एक अंश)

posted Jan 5, 2011, 5:39 PM by Abhishek Ojha   [ updated Nov 10, 2011, 8:39 PM ]
अगर मैं तुमको ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार-नहाई कुँई.
टटकी कली चम्पे की
वगैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा ह्रदय उथला या कि  सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है.
बल्कि केवल यही :
ये उपमान मैले हो गए हैं.
देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच ! - अज्ञेय

Comments