बिगाड़ के डर से

posted Jan 15, 2016, 2:32 PM by Abhishek Ojha   [ updated Aug 17, 2016, 4:20 PM ]
 कल किसी बात पर ये बात आ गयी  - कि बहुत कठिन है अपनों को खरी खरी कहना।

फिर ये बात आयी कि... आठवीं क्लास में मेरे गणित के शिक्षक ने मुझे खुद के क्लास की कॉपी चेक करने को दे दी थी। कुछ 4, 5 बच्चों की कॉपी, जिनमें मैं भी शामिल था, को छोडकर। मैं बहुत खुश - फूल के कुप्पा हो जाने टाइप्स। 'बिगाड़ के डर से ईमान छोड़ दोगे?' की तर्ज पर मैंने जिन्हें 39 आए उन्हें भी 40 नहीं किया।

कई दोस्त नाराज हुए। नाराजगी जायज थी? पता नहीं ! पर बड़ी कठिन स्थिति रही कुछ दिन।
39 वाले ने कहा था- 'सर ने एक नंबर से फेल कर दिया होता तो कोई बात नहीं पर तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? '
 बड़ा मुश्किल होता होगा 'बिगाड़ के डर से ईमान छोड़ दोगे?' पर टिके रहना ! उलझाऊ काम है अपनों से उलझना... शायद इसीलिए बड़े-बड़े अपनों के सामने बर्बाद हो जाते हैं। भावनाओं में फंसा इंसान - धृतराष्ट्र हो जाने को जस्टिफ़ाई किया जा सकता है शायद। पर होना चाहिए- पत्थर के दिल मोम न होंगे टाइप्स !

...वैसे ही बहुत कम लोग होते होंगे जो गलती कर अपनों का डांटना बर्दाश्त कर पाएँ ! अपनी गलती देखने की वजाय तुरत  किसी और चीज से जोड़ लेते हैं लोग आपके पत्थर होने को । समझाया भी नहीं जा सकता सबको। समझाया भी  उन्हीं को जा सकता है जिन्हें न भी समझाया जाय तो देर-सवेर खुद समझ लेंगे !  :) बाकी सर पटकते रहिए।  इससे याद आया - निंदक नियरे राखिए वाली बात होती होगी। पर निंदक को शायद इसीलिए कुटी छवाय कर रखने की बात है  क्योंकि निंदक बाहरी ही हो। करीबी लोग जिनके लिए कुटी छवाने की जरूरत नहीं, जो घर में रह लेते हैं  वो निंदक हो जाएँ तो हम उनसे ही नफरत करने लग जाएंगे !  नहीं?

एनीवेज :)

फिर एक नया साल आ गया ! फिर इसलिए कि पता नहीं चला कब निकल गया पिछला वाला। पता नहीं चला यानि जरूर अच्छा रहा होगा। ... मेरे दोस्त ने पूछा 'सोशल मीडिया का बायकाट' कब तक करोगे?
मैंने कहा - बायकाट कहाँ है? जब तक कोई बड़ा कारण न हो वापस आने का। तब तक एक ट्वीट्टर ही ज्यादा है।
साल अच्छा था। मूड के देखूँ तो झक्कास ! लगभग आठ सप्ताह छुट्टी ली गयी।  घूमा गया जम के... कई काम हुए जिनके बारे में कभी सोचा गया था। कुल मिला के एक धांसू  साल कहा जा सकता है।  ...लेकिन मूड के क्या देखना जी ! मैं वैसे भी मूड के देखूँ तो सिर्फ खूबसूरती दिखाई देती है। मेरे जैसे लोगों के 'मोमेंट ऑफ रिफ़्लेक्शन' नहीं होने चाहिए। सावन के अंधे को हरा ही हरा टाइप देखने वाला जीव मीन-मेख निकाल के नहीं देख सकता कि यूं होता तो क्या होता...  :)

थोड़ा ज्यादा हो गया हम तथागत भी नहीं हैं पर अब जो है सो ... !  :)

आप ये पढ़ रहे हैं तो आपका साल चकाचक हो। नहीं पढ़ रहे हैं तो भी :)

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