गप्प !

posted Jul 6, 2016, 3:15 PM by Abhishek Ojha   [ updated Aug 1, 2016, 1:08 PM ]

कितने सारे लोगों से हम मिलते रहते हैं फिर कुछ लोगों में ऐसा क्या होता है ...कि जब हम उनसे बात करते  हैं तो करते ही चले जाते हैं. बिन प्लान, बिन एजेंडा, बिन कुछ सोचे ! हम खुलते चले जाते हैं, उधड़ते चले जाते हैं, बातें खुद-ब-खुद निकलती चली जाती हैं.  आज जिंदगी के वैसे लोगों की बात...

पता नहीं ये कैसे होता है. मुश्किल है बता पाना. इतना पता है कि कोशिश करके ये नहीं किया जा सकता. स्वतः होने वाली प्रक्रिया है. समझने की कोशिश करें तो... 'क्वान्टीफाई' तो नहीं ही किया जा सकता इसे 'मॉडल' कर 'फार्मूला' भी नहीं बनाया जा सकता. कई बातें हो सकती है - किसी का व्यक्तित्व, रंग-रूप, पढाई, सोच, ज्ञान, अदा, रिश्ता, बात करने का तरीका, 'चार्म' जैसा कुछ... ऐसे कई कारण गिनाये जा सकते हैं. पर इन सबसे परे कुछ ऐसा होता है जिससे हम खींचते चले जाते हैं. हमें सोचना नहीं पड़ता कि क्या बात करें ! अगर हमें ये सोचना पड़े कि क्या बात करें तो हम उस इंसान से 'प्रवाह' में बहते हुए बात नहीं कर सकते. रिश्ता, पहचान जैसी बातों के परे कुछ होता है. अज्ञेय के शब्दों में -  "ये पहचानें हैं जिनसे मैं अपने को जोड़ नहीं पाता. ये अजनबीयतें हैं जिन्हें मैं छोड़ नहीं पाता।" पहचानें तो सिर्फ गिनाये जाने वाले कारण हैं उनमें ऐसा कुछ नहीं जिससे हम किसी से इस तरह जुड़ते चले जाएँ. पहचानों में से भी वैसे लोग निकल सकते हैं बट दैट्स नाइदर नेसेसरी नॉर सफिसिएन्ट।

ऐसे लोगों से एक - फ्रीक्वेंसी मैच होता है- फिजिक्स के रेजोनेंस जैसा कुछ. एक दुसरे की बातों में उन्हें अतिशय खूबसूरती दिखती है. वो हमारे भटके हुए हिस्से जैसे होते हैं. उनसे मिल एक अजीब सी ख़ुशी होती है. एक तरह की पूर्णता. उनकी बेवकूफाना-रैंडम बातों में एक अजीब सी अदा होती है. एक खूबसूरती.. एक कभी ख़त्म न होने वाली उत्सुकता. एक बालपन. सहजपना. या पता नहीं क्या कहते हैं उसे. गंभीर बातें - फॉर्मल किसी से भी की जा सकती हैं पर ऐसी बेवकूफाना-रैंडम  बातें सिर्फ वैसे लोगों से। किसी और के सामने हम खुल ही नहीं पाते।

अगर किसी को आपसे कहना पड़े - 'कुछ बोलो? और बोलो?' और आप 'ब्लैंक' हो जाएँ ! आपके पास इस संसार में कुछ न हो कहने को. आप कोशिश कर के, सोच के क्या बात कर लेंगे?

कैसा दिन रहा? क्या हाल चाल? जिंदगी कैसी कट रही है? मौसम कैसा है? तुम्हारे सर के ऊपर का छत कैसा है? गली का कुत्ता कैसा है? और बाकी सब? ठीक?
कितनी बार और कब तक आप ये सब पूछेंगे? बहुत जल्द आपको लगता है अब कुछ नहीं बचा बात करने को - 'ब्लैंक'. बिन स्रोत का कुआँ सुख ही जाना है !

और क्या बोलूँ... तुम पूछो (बोलो) कुछ !

पता नहीं सबके साथ ऐसा होता है या नहीं पर मैं इस मामले में- बाइनरी . या तो सामने वाला कहेगा - तुम तो कुछ बोलते ही नहीं या - तुम चुप ही नहीं होते हो ! 

बीच का नहीं. बीच का 'फॉर्मल'.. काम से काम. मेरे बगल में कई साल तक ऑफिस में बैठे रहने वाले लोगों से भी काम से काम रहा. रोज मिलकर भी अजनबी ही रहे. और कई लोग जिनसे कभी मिलना भी नहीं हुआ - अजनबी !  उनसे 'चुप ही नहीं होने' के लेवल तक बातें होती हैं. वो लोग.. कुछ बात होती हैं उनमें. ऐसा नहीं कि हम उनसे अक्सर संपर्क में रहते हैं. पर वो .. कहीं न कहीं साथ रह जाते हैं. महीनों, सालों बाद भी बात हो तो फिर वो उसी प्रवाह से होती है. सुबह-शाम-भूख-प्यास-मीटिंग-काम सब छोड़ - अनियंत्रित. जैसे नदी पर बना बांध हो. जैसे हमें कुछ लोगों से समझ में नहीं आता क्या बात करें वैसे ही यहाँ हमें सोचने की फुर्सत ही नहीं होती कि क्या बोलना है. दो बातों के बीच सांस लेने की फुर्सत नहीं जैसा कुछ. एक के बाद एक बातें उभरती चली जाती हैं. बातों का इन्फाइनाईट लूप ! हम बस बात किये चले जाते हैं - राजनीति, खेल, लिखना, पढना, कला, विज्ञान, ब्रह्माण्ड, बाजार, दर्शन, धर्म,  ट्वीट, छत, कुत्ता, बिल्ली, मौसम, रिश्ते, नाते, ऑफिस, जिंदगी, शायरी, प्यार, नफरत, अच्छाई, बुराई, ईंट, पत्थर, आलू, बैगन .. कहने का मतलब कुछ भी ! बिन अजेंडा ! बात कुछ भी हो ख़ुशी वैसी ही होती है. उसी चाव से बोलना, उसी मुग्धता से सुनना. बाँध टूटता है फिर कहाँ सोचना होता है कि आगे रास्ता कैसे मिलेगा? नदी रास्ता बनाते जाती है. और जाती भी कहाँ है तो सागर में - अनंत ! लो कर लो बात ! ग्लेशियर पिघलता जाता है, बाँध टूटते जाते हैं, नदी बढती जाती है - कभी अठखेलियाँ करते किनारे तोड़ते तो कभी शांत ! पर फ्लो नहीं रुकता - बहता पानी निर्मला - प्रसन्न चित्त ! मन हरा भरा होता चला जाता है. नदी के किनारे जीवन बसता है. सभ्यताएं बस्ती हैं. मिथ जन्म लेते हैं. कहानियाँ बनती हैं. विज्ञान जन्म लेता है. क्रांति होती है.

हम खुलते चले जाते हैं... किसी ने कभी कहा था - एक बुने हुए स्वेटर का एक छोर पकड़ में आ गया हो उस तरह हम फर्र से खुलते चले जाते हैं. वो हम जैसा ही कोई होता है जो वो छोर पकड़ पाता है।

ऐसे कई लोग हैं जिंदगी में। अद्भुत लोग। कई ऐसे लोगों से भी जिनसे कभी मिलना नहीं हुआ. वैसे  आज के जमाने में मिलने का मायने रह जाता है कुछ ? दिन-रात बिन सोचे उनसे बात की जा सकती है. वो हमारे खोये हुए हिस्से होते हैं. हम जो जिग्सा पज़ल हैं उसके गुम हिस्से.

किसी से आप बात करना कैसे शुरू करते हैं? मुझे नहीं लगता मैंने कभी शुरू किया होगा - घोर अंतर्मुखी इंसान ! पर जब कोई और करता है तो बस कभी शुरू ही नहीं हो पाता और कभी अंत ही नहीं होता !

ऐसे देखते हैं इसे... जब कोई नयी अद्भुत सी बात पढने को मिली हो, कोई नयी चीज सिखने को मिली हो. कुछ नया समझ में आ गया हो. ऐसी ख़ुशी हो जिसे हम किसी से कहने को बेचैन हों ... वो समझ, वो बात एक बीज जैसी होती है जिसे उपजाऊ जमीन मिल जाए तो वो एक लहलहाता पेंड बन जाता है. वैसे लोग उपजाऊ जमीन , खाद , पानी सब होते हैं। पर वही बात अव्वल तो हम किसी और से कर भी नहीं सकते दुसरे... अगर जबरदस्ती कोशिश भी कर लें तो उस बात की बंजर में पड़े बीज की हालत हो जानी है. ऐसी प्रतिक्रिया मिल जायेगी कि हमारी एक्सआइटमेंट ही फुस्स ! शायद कुछ लोग कर पाते हों किसी से भी हर तरह की बात. पर मेरे साथ - बाइनरी - ० या १. बीच का कुछ नहीं ! पेंड या बंजर. शायद हमारी हर बात सबको अच्छी नहीं लगती न वो समझ पाते हैं कि कैसे सुनना है, सुनकर क्या समझना है। गया बीज बंजर में ! न तो बेकूफ़ियाँ सबको खूबसूरत लग सकती हैं न गंभीर दर्शन.. पर वैसे लोग होते हैं जिनसे... 

हम अपनी जिंदगी में किसी को उस तरह चाह कर नहीं ला सकते.. हमारे उसशेल के अन्दर जिन्हें आना होता है वो बिना प्रयास घुस आते हैं. हम कितने भी अंतर्मुखी क्यों न हो. शेल को पिघलाने की गर्मजोशी ऐसे लोगों के अन्दर होती है. जब तक हम सोच पाएं वो वहां पंहुच चुके होते हैं.  जिनके पास वो  गर्मजोशी नहीं होती तो बस नहीं होती ! वैसे ही हमारे अंदर भी ये बात सबके लिए नहीं होती।

ये हीरे जैसे लोग...  हर किसी के अपने ऐसे लोग होते होंगे. खुशकिस्मत हैं जिनके पास ज्यादा हैं. जिनके पास ऐसे लोग कभी थे वो जानते हैं कि 'रहे न रहे वो महका करेंगे बन के कली...' टाइप.

बात गप्प की होनी थी और कहाँ चली गयी !... जब हम 'वैसे' लोगों से प्रवाह में बात किये चले जाते हैं तो भी ऐसा होता है जब घंटो बाद रियलाइज होता है कि जो बात करनी थी वो तो की ही नहीं. क्योंकि एजेंडा तो होता नहीं, अगर होता भी है तो वो प्रवाह की अठखेलियों में अक्सर कहीं खो जाता है !

Comments