True for you... but not for me :)

posted Oct 9, 2014, 6:24 PM by Abhishek Ojha   [ updated Oct 9, 2014, 6:25 PM ]

Like me, You must also have read and felt something like this again and again... (this is from Think like a Freak) -

We operate from a set of biases we cannot even see. As the behavioral sage Daniel Kahneman has written: “We can be blind to the obvious, and we are also blind to our blindness.” Few of us are immune to this blind spot. That goes for you, and that goes for the two of us as well. And so, as the basketball legend-cum-philosopher Kareem Abdul-Jabbar once put it, “It’s easier to jump out of a plane—hopefully with a parachute—than it is to change your mind about an opinion.”

…but.. interesting thing is - the moment we read it, we think about others - how they operate from their own biases and don't listen to us. but we hardly think that it is true and -exactly same- for us as well ! All of us at some point feel we understand the psychology of people around us... except we never understand our own !

On the similar note.. jumping out of a plane being easier example reminded me of Few shlokas of NitiShatakam by Bhatrihari -

अज्ञः सुखं आराध्यः सुखतरं आराध्यते विशेषज्ञः ।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति ।। 
(अज्ञानी व्यक्ति को समझाना आसान है, बुद्धिमान (विशेषज्ञ) को समझाना उससे भी आसान है किन्तु ज्ञानी होने का दम्भ रखने वाले अल्पज्ञानी को ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते)

प्रसह्य मणिं उद्धरेन्मकरवक्त्रदंष्ट्रान्तरात् समुद्रं अपि सन्तरेत्प्रचलदूर्मिमालाकुलं ।
भुजङ्गं अपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारयेत् न तु प्रतिनिविष्टमूऋखजनचित्तं आराधयेथ् ।। 
(मनुष्य के लिए मगरमच्छ के दांतों में से मणि निकालना संभव है, चंचल लहरों वाले समुद्र को पार किया जा सकता है, क्रोधित सर्प को भी फूलों की माला की तरह पहना जा सकता है, लेकिन एक मुर्ख को सही बात समझाना असंभव है) 

लभेत सिकतासु तैलं अपि यत्नतः पीडयन् पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः ।
क्वचिदपि पर्यटन्शशविषाणं आसादयेत् न तु प्रतिनिविष्टमूर्खचित्तं आराधयेथ् ।। 
(प्रयत्न कर रेत को पेरकर तेल निकालना संभव हो सकता है, मृग मरीचिका से भी प्यास बुझाई जा सकती हो, सिंग वाले खरगोश मिल जाए लेकिन पूर्वाग्रही मुर्ख को मनाना असंभव है)

व्यालं बालमृणालतन्तुभिरसौ रोद्धुं समुज्जृम्भते छेत्तुं वज्रमणिं शिरीषकुसुमप्रान्तेन सन्नह्यति ।
माधुर्यं मधुबिन्दुना रचयितुं क्षारामुधेरीहते नेतुं वाञ्छन्ति यः खलान्पथि सतां सूक्तैः सुधास्यन्दिभिः ।। 
(अच्छी और मीठी बातों से दुष्ट/मुर्ख को सन्मार्ग पर लाने का प्रयास करना वैसे ही है जैसे कमल की पंखुड़ी से मतवाले हाथी को वश में करना, शिरीष फूल की पंखुड़ी से हीरा काटना और शहद की एक बून्द से समुद्र को मीठा बनाना.)

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