थारे जैसा ना कोई !

posted Aug 21, 2016, 7:18 PM by Abhishek Ojha   [ updated Aug 22, 2016, 11:36 AM ]

नोकिया के पुराने फ़ोन वाला ‘स्नेक’ गेम याद है?


पहली बार जब वो बेमिशाल चीज, जिसे कंप्यूटर कहते हैं, देखा था? ‘डॉस’ ऑपरेटिंग सिस्टम वाला और पैक मैन?


जब जूते बाहर उतारकर कंप्यूटर रूम में जाना होता था? फ्लॉपी डिस्क जब तोप चीज हुआ करती ! वॉक-मैन फ्यूचर। स्नेक गेम लोगों को बर्बाद करता था - शायद पहला वायरल गेम. अब जिसने पहली बार लैंडलाइन फ़ोन के बाद नोकिया का वो फ़ोन देखा होगा उसने क्यों नहीं कहा होगा कि इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता। डॉस की काली-सफ़ेद स्क्रीन के बाद पहली बार जब किसी ने विंडोज देखा होगा? कैसा महसूस हुआ होगा उसे? क्यों न मर गया होगा वो उस पर. क्यों न वो वादा कर गया होगा अपने आप से कि जिंदगी में इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता ! जिंदगी से अब और कुछ नहीं चाहिये। - तुम जो मिल गए हो तो ये लगता है के जहाँ मिल गया है !


फिर… विंडोज एक्सपी, सेवन, टेन ! मैक, उबंटू…. मल्टी टच, आईफोन, आईपैड। विंडोज का पहला वर्जन देखकर पागल हो जाने वाले की क्या गलती अगर अब वो मैक के पीछे पागल है? नोकिया के स्नेक के पीछे कभी पागल रहे को अब ‘पोकेमॉन गो’ में जहाँ मिलने लग गया !


मेरे एक दोस्त के पिताजी, जिन्होंने हमेशा राजदूत चलाया था, पहली बार हीरो हौंडा स्प्लेंडर पर बैठने के बाद कहा था कि… 'आज मेरी उम्र दस साल कम हो गयी. क्या गाडी है !' मैं तब बच्चा था मैंने सोचा था - 'पहली बार लम्ब्रेटा चलाने वाले ने भी कभी ऐसा ही कहा होगा।' और सोचिये तो जरा क्या ज़माना रहा होगा अपनी गर्लफ्रेंड को जिसने लम्ब्रेटा पर बिठाया होगा... बैलगाड़ी के हीरो वाले जमाने में। इलाके में क्या हुआ होगा?


कितनी चीजों का हमें हद तक नशा हो जाता है. देख के लगता है ये है - भविष्य ! हम खुशकिस्मत हैं जो ये देखने को मिला. जीवन में इससे अच्छा लम्हा नहीं आ सकता.


पर… वहीँ कौन रुक जाता है? ‘ठहर जाए ये लम्हा’ कहने को तो हम कह देते हैं. अगर ठहर जाए तो कितने पल को हम झेल पाएंगे उस लम्हे को? लम्हों की निरंतरता , उसका बीतते जाना और फिर उसके बीत जाने के बाद की ‘नोस्टालजिया’ में हम जी लेते हैं. अगर वो लम्हा रुक गया होता तो बोझिल हो गया होता. दम घुट गया होता। खैर…. बात ये नहीं थी. बात ये थी कि पसंद, महसूस, भविष्य और वादे वगैरह- देश और काल (टाइम, स्पेस) के फंक्शन होते हैं. एक टाइम-स्पेस का ईमानदार वादा किसी और टाइम-स्पेस का बकवास बन जाता है, नहीं? जिसे हम कहते हैं - वक़्त बदलता है. सब कुछ बदल देता है. सब कुछ भर देता है. आपको भी और हमें भी? आपको डॉस, जूता पहन कर कंप्यूटर रूम में जाना, पैक-मैन और प्रिंस और पर्शिया खेलना याद आ रहा है? जीडब्ल्यू बेसिक? पहली मोटर साइकिल? फ़ोन? या… कुछ और वो जो कल का सबसे खूबसूरत लम्हा सच था जो आज नहीं है?


बाई द वे… लॉजिक अच्छा है पर… अगर आप वो सोच रहे हैं जो मैं सोच रहा हूँ कि आप ये पढ़ते हुए सोच रहे होंगे तो… ‘रिश्ते’ चीज नहीं होते। भावनाएं चीज नहीं होती. लोग चीज नहीं होते… संसार में वो सब कुछ जो ‘चीज’ नहीं है, वस्तु नहीं है - एवरीथिंग दैट इज नॉट अ थिंग - वनली दैट इज नॉट रीप्लैसबल। सृष्टि में हर वो बात जिसके लिए हम समझ नहीं पाते कि वो था क्या ! वो है क्या? उपयोग से परे, इस्तेमाल से परे… ज्ञान, प्यार, एसेंस, कालातीत। जिसे सोचते-सोचते कि - मैं क्या हूँ, तुम क्या हो - योगी कह जाते हैं - अहम् ब्रह्मास्मि ! उस हिस्से को छोड़ कर हर चीज का स्थान कुछ और लेता जाता है. अक्सर उससे बेहतर - कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले। तुम रीप्लैसबल हो, हम भी हैं. पर हम-तुम में जो हम-तुम के परे था (है) वो रीप्लैसबल नहीं है. हम-तुम में जो ‘चीज’ है - डॉस जैसा - नोकिया के स्नेक जैसा - वो सच था अपने समय का - वो लम्हा सच था - वो नशा सच था - ये नशा भी सच है - आज का. 

 खैर… चलते रहना चाहिए. नहीं तो डॉस पर अटके रह जाएंगे हम सब. उड़ने पर ही दीखता है - बहुत बड़ा है यह संसारएक रास्ता है जिंदगी - जो थम गए तो कुछ नहीं !

 हरी ॐ तत्सत् !

:)

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